सुप्रीम कोर्ट ने भगवान जगन्नाथ पर आधारित एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि कुछ लोगों की धार्मिक भावनाओं के आधार पर फिल्मों और कला पर प्रतिबंध लगाने की मांग स्वीकार कर ली जाए, तो देश में कला, साहित्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा।

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने बुधवार को उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने और पहले दिए गए आदेश में संशोधन की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) से प्रमाणपत्र मिल चुका है और इससे पहले भी अदालत ने रथ यात्रा समाप्त होने के बाद 28 जुलाई या उसके बाद फिल्म रिलीज करने की अनुमति दी थी।

‘हर व्यक्ति की अपनी रचनात्मकता होती है’

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि दो-तीन लोगों की आपत्ति के आधार पर फिल्मों और कलात्मक प्रस्तुतियों पर रोक लगाने लगे, तो रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों की विभिन्न व्याख्याएं भी बंद करनी पड़ेंगी।

उन्होंने कहा, “हमारे पास कबीर की रामायण है, हर राज्य में रामायण की अलग परंपरा है। हर व्यक्ति अपनी रचनात्मकता के अनुसार अभिव्यक्ति करता है। यदि हम ऐसी रोक लगा दें, तो टीवी पर प्रसारित होने वाली रामायण और महाभारत भी बंद हो जाएंगी।”

‘बच्चों के लिए बनाई गई है एनिमेटेड फिल्म’

पीठ ने यह भी कहा कि ऐसी फिल्मों को बनाने में बहुत ज्यादा रिसर्च किए जाते हैं। केवल कुछ लोगों की आपत्ति के कारण कलाकारों की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “क्या सिर्फ दो-तीन संवेदनशील लोगों की वजह से हम यह कह दें कि देवी-देवताओं पर कोई रचनात्मकता, साहित्य या मूर्तिकला नहीं हो सकती? एनिमेशन फिल्में बच्चों के लिए बनाई जाती हैं। कलाकारों को इस तरह बंधक नहीं बनाया जा सकता।”

मंदिर समिति ने जताई थी आपत्ति

सुनवाई के दौरान ओडिशा सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल प्रीतांबर आचार्य ने मंदिर समिति का पक्ष रखते हुए कहा कि फिल्म निर्माता ने पहले भगवान जगन्नाथ के एनिमेटेड चित्रण को लेकर धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए कुछ बदलाव करने का आश्वासन दिया था। उनका कहना था कि भगवान जगन्नाथ को डोरेमोन और स्पाइडरमैन जैसे स्टाइल में दिखाए जाने पर लोगों ने आपत्ति जताई थी। हालांकि, फिल्म प्रोड्यूसर की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट देवदत्त कामत ने अदालत में इस तरह का कोई भी भरोसा देने से इनकार किया।

पहले हाई कोर्ट ने लगाई थी रोक

गौरतलब है कि फिल्म 17 जुलाई को रिलीज होने वाली थी, लेकिन 15 जुलाई को ओडिशा हाई कोर्ट ने इसकी रिलीज पर अंतरिम रोक लगा दी थी। यह आदेश एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई के दौरान दिया गया था, जिसमें फिल्म के प्रदर्शन और रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रथ यात्रा समाप्त होने के बाद फिल्म की रिलीज की अनुमति दे दी थी।

यह भी पढ़ें: ‘बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था, यह कहना राष्ट्रविरोधी नहीं’

कोर्ट ने कहा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को न गिराए जाने के पक्ष में राय व्यक्त करना राष्ट्र-विरोधी नहीं माना जा सकता। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।