सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादस्पद फैसले को पलट दिया है। जिसमें कहा गया था कि किसी बच्ची के स्तन पकड़ना, उसके पाजामा का नाड़ा तोड़ना और उसे नाले के नीचे घसीटने की कोशिश करना बलात्कार या बलात्कार की कोशिश नहीं है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली ने पीठ ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायनिर्णय के लिए कानूनी तर्क और सहानुभूति दोनों की आवश्यकता होती है। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एनवी अंजारी शामिल थे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि हम हाई कोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं हो सकते कि आरोप केवल बलात्कार के अपराध को अंजाम देने की तैयारी के बराबर हैं,न कि प्रयास के।

10 फरवरी, 2026 को दिए गए अपने फैसले में पीठ ने यह भी चेतावनी दी कि यदि अदालतें वादियों द्वारा सामना की जाने वाली विशिष्ट कमजोरियों के प्रति असंवेदनशील बनी रहती हैं तो “पूर्ण न्याय” नहीं मिल सकता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की विवादास्पद टिप्पणियां 17 मार्च, 2025 को दो आरोपियों के खिलाफ जारी समन आदेश में संशोधन करते समय सामने आईं थीं। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि आरोपी पवन और आकाश ने 11 वर्षीय लड़की के स्तन पकड़े, उसके पाजामा का नाड़ा तोड़ दिया और राहगीरों के हस्तक्षेप से पहले उसे एक पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश की।

ट्रायल कोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत बलात्कार के प्रयास या यौन उत्पीड़न के आधार पाए थे और POCSO अधिनियम की धारा 376 (बलात्कार) और धारा 18 के तहत आरोप लगाने के लिए समन जारी किया था।

हालांकि, हाई कोर्ट ने आरोपों को IPC की धारा 354-बी (वस्त्र उतारने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) में बदल दिया। अपने आदेश में जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा कि लड़की के निचले वस्त्र की डोरी तोड़ते हुए पकड़े जाने पर दोनों आरोपी मौके से फरार हो गए। जस्टिस मिश्रा ने आगे कहा कि घटनाक्रम से ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता जिससे यह पता चले कि आरोपियों का बलात्कार करने का वास्तव में इरादा था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस मिश्रा ने कहा कि यह तथ्य यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आरोपियों ने पीड़िता के साथ बलात्कार करने का निश्चय किया था, क्योंकि इन तथ्यों के अलावा, बलात्कार करने की उनकी कथित इच्छा को आगे बढ़ाने के लिए उन पर कोई अन्य कृत्य नहीं थोपा गया है। इस घटनाक्रम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश का स्वत: संज्ञान लेते हुए 26 मार्च, 2025 को इसके कार्यान्वयन (Implementation) पर रोक लगा दी।

अपने फाइनल फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के लिए तत्काल दिशानिर्देश तैयार करने से इनकार कर दिया। बार एंड बेंच के अनुसार, न्यायालय ने कहा कि विभिन्न संवैधानिक और वैधानिक निकायों द्वारा किए गए इस प्रकार के पिछले प्रयासों, उनके जमीनी परिणामों और इसी तरह के संवेदनशील मामलों में पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं के विभिन्न पहलुओं की व्यापक समझ के बिना, हम इस स्तर पर कोई भी दिशानिर्देश निर्धारित करने का नया और अनियंत्रित प्रयास करने में संकोच कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों और संवेदनशील व्यक्तियों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट और सुलभ दिशा-निर्देश तैयार करने की बात कही है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इन दिशा-निर्देशों में सरल भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए और देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखा जाना चाहिए, ताकि आम लोगों को भी बेहतर समझ प्राप्त हो सके।

इसके बजाय, अदालत ने विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने के लिए भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) से संपर्क किया। समिति का कार्य यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में न्यायाधीशों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता का भाव विकसित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने पर एक रिपोर्ट तैयार करना है।

कमेटी को यह निर्देश भी दिया गया था कि वह इस संबंध में विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करे कि न्यायपालिका को यौन अपराधों से जुड़े मामलों और कमजोर पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं या गवाहों से संबंधित अन्य मामलों से कैसे निपटना चाहिए। इन दिशा-निर्देशों को तैयार करने के लिए नियुक्त समिति को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।

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इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि NJA की रिपोर्ट और मसौदा दिशानिर्देश में भारत की भाषाई विविधता को ध्यान में रखा जाना चाहिए और यह जनता के लिए आसानी से समझने योग्य होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया में सहानुभूति के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया में भागीदार के रूप में हमारे निर्णय, आम नागरिकों द्वारा सामना की जाने वाली प्रक्रिया को निर्धारित करने से लेकर किसी भी मामले में दिए गए अंतिम निर्णय तक, करुणा, मानवता और समझ की भावना को प्रतिबिंबित करना चाहिए, जो एक निष्पक्ष और प्रभावी न्याय प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।

कोर्ट ने प्रणालीगत सुधारों और न्यायाधीशों के बीच संवेदनशीलता विकसित करने के उपायों की आवश्यकता को स्वीकार किया। साथ ही कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि न्यायपालिका के सदस्यों के दृष्टिकोण के साथ-साथ संबंधित अदालती प्रक्रियाओं में अंतर्निहित संवेदनशीलता और विवेक को विकसित करने और पोषित करने के लिए कुछ कार्रवाई की आवश्यकता है। पीठ ने इस बात पर भी जोर दिया कि यौन अपराध के मामलों में न्याय को सख्त कानूनी व्याख्या से परे जाकर कमजोर वादियों की व्यापक जरूरतों और वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

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