सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (पॉलिगैमी) पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी सुधारों की भी मांग की गई है।

यह याचिका महिला अधिकार कार्यकर्ता जाकिया सोमन की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) के साथ कुछ शिक्षाविद और पत्रकार भी शामिल हैं।

सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता श्रिया मैनी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिट याचिका पर नोटिस जारी करते हुए उसमें की गई चार प्रमुख मांगों पर गौर किया है।

याचिका में क्या मांग की गई?

याचिका में पहली मांग मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह की प्रथा को पूरी तरह खत्म करने की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के लिए अन्याय और कठिनाइयों का कारण बनती है।

दूसरी मांग में अदालत से यह घोषित करने की अपील की गई है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के तहत बहुविवाह को अवैध माना जाए।

याचिका में तीसरी मांग यह है कि एक विशेष कोष बनाया जाए जिससे बहुविवाह से प्रभावित पहली और दूसरी पत्नी को आर्थिक सहायता और अंतरिम राहत दी जा सके।

चौथी मांग में मुस्लिम विवाह और तलाक के लिए भी हिंदू विवाह की तरह अनिवार्य वैधानिक पंजीकरण व्यवस्था लागू करने की अपील की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे महिलाओं के भरण-पोषण, उत्तराधिकार और आवास जैसे अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई में केंद्र का पक्ष सामने आने के बाद अदालत आगे की कार्रवाई करेगी।

‘अगर मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी का भरण-पोषण…

अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने में असमर्थ है तो वो बहुविवाह नहीं कर सकता है। केरल हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जो भीख मांगकर गुजारा करने वाले अपने पति से 10,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता मांग रही थी।

इससे पहले परिवार न्यायालय ने महिला की याचिका खारिज कर दिया थी कि उसका पति भिखारी है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।