सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को जजों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी पर चिंता जताई। वे महिला दिवस के मौके पर Indian Women in Law द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में बोल रहे थे।
बार एंड बेच रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम की प्रक्रिया इतनी अपारदर्शी है कि कई बार जजों को भी ठीक से पता नहीं होता कि यह कैसे काम करती है और इसकी बैठकें कहां होती हैं। उन्होंने कहा कि आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमें न सिर्फ यह नहीं पता कि अंदर क्या चल रहा है, बल्कि कई बार यह भी नहीं पता होता कि कॉलेजियम की बैठक कहां हो रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि जजों की नियुक्ति हमेशा योग्यता (मेरिट) के आधार पर होनी चाहिए, न कि सिर्फ महिला-पुरुष के संख्यात्मक प्रतिनिधित्व के आधार पर।
जस्टिस दत्ता, जिन्होंने पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया था। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान, वस्तुनिष्ठ मानदंडों के अभाव का मतलब था कि न्यायाधीशों को अपने समक्ष पेश होने वाले अधिवक्ताओं के अपने स्वयं के आकलन पर निर्भर रहना पड़ता था।
उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट में, चूंकि कोई वस्तुनिष्ठ मापदंड नहीं था, इसलिए हमने अपने सामने मौजूद वकीलों के प्रदर्शन का आकलन किया। बाद में न्यायाधीश बनी महिलाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “न्यायमूर्ति शम्पा सरकार, न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा, न्यायमूर्ति मौशुमी भट्टाचार्य, जिस तरह की पूछताछ का सामना मैंने वहां (कलकत्ता उच्च न्यायालय में) किया… अब मुझे यकीन है कि वे सभी वकीलों को संभाल सकते हैं।
जस्टिस दत्ता ने न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर होने वाली बातचीत को महज आंकड़ों तक सीमित करने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की बात आती है तो मैं संख्या के आधार पर फैसला नहीं करूंगा। यह सवाल नहीं कि 50 में से 25 महिलाएं क्यों नहीं हो सकतीं, 30 क्यों नहीं हो सकतीं? यह लैंगिक भेदभाव है। हमें योग्यता को प्राथमिकता देनी चाहिए। न्होंने कहा कि न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति के लिए प्रमुख कारक योग्यता, सत्यनिष्ठा और स्वभाव होने चाहिए।
दत्ता ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान की एक घटना का भी जिक्र किया। जब उन्होंने एक महिला वकील को पदोन्नति के लिए सिफारिश करने के सुझाव को अस्वीकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि एक जज ने मुझे फोन किया और कहा कि छह लोगों के नाम सुझाए जा रहे हैं। तो उस महिला का नाम क्यों नहीं? मैंने उस जज से साफ कह दिया कि नहीं। मैंने कहा कि वह वकील मेरे सामने पेश हुई थी और वह अपरिपक्व थी, और मुझे उसे परिपक्व होने के लिए समय देना होगा।
उन्होंने आगे कहा कि हाई कोर्ट कॉलेजियम के बहुत कम न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के ऐसे अनुरोधों का विरोध करने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध प्राप्त होने पर ‘ना’ कहने का साहस बहुत कम न्यायाधीशों में होता है। मैंने उनसे कहा कि यह मेरा निर्णय है। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में, जब तक मैं संतुष्ट नहीं हो जाता, मैं सहमत नहीं होऊंगा।
जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि कॉलेजियम के भीतर असहमति से अंतिम परिणाम में जरूरी नहीं कि कोई बदलाव आए। उन्होंने कहा कि हाल ही में कॉलेजियम में एक महिला न्यायाधीश थीं और उनके असहमति जताने के बावजूद नियुक्ति हो गई।
उन्होंने इस बात को दोहराते हुए अपनी बात समाप्त की कि प्रतिनिधित्व को प्रतीकात्मक नहीं बनना चाहिए। मैं प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व के खिलाफ हूं। अगर कोई न्यायाधीश बनने के योग्य है तो उसे न्यायाधीश बनना चाहिए। यह चर्चा उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर आयोजित एक सत्र का हिस्सा थी।
सुप्रीम कोर्ट ने वकील को लगाई कड़ी फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने एक ही वकील द्वारा दायर की गई 5 फालतू की जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने पूछा कि क्या उन्होंने ये याचिकाएं आधी रात को लिखी थीं। इन याचिकाओं में से एक में प्याज और लहसुन में ‘तामसिक’ (नकारात्मक) ऊर्जा की मौजूदगी पर वैज्ञानिक अध्ययन की मांग की गई थी। पढ़ें पूरी खबर।
