सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के बाबुलनाथ मंदिर के एक हिस्से में रह रहे ‘साधु’ को चार साल के भीतर उस जगह को खाली करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने इसी के साथ मुंबई हाई कोर्ट के बेदखली के आदेश को बरकरार रखा है। उच्चतम न्यायालय द्वारा किसी स्थान या परिसर को खाली करने के लिए इतनी लंबी अवधि देना दुर्लभ है, लेकिन सांसारिक जीवन का त्याग कर धार्मिक और आध्यात्म के रास्ते पर अग्रसर 75 वर्षीय साधु की उम्र को देखते हुए शीर्ष अदालत ने यह निर्णय लिया।
यह विवाद मुंबई के गामदेवी में स्थित सदियों पुराने बाबुलनाथ मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों के एक चबूतरे पर स्थित एक छोटे से क्षेत्र को लेकर है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ जगन्नाथ गिरि की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसने कहा कि अदालत के समक्ष ऐसा कुछ भी नहीं लाया गया है जो लघु वाद न्यायालय और अपीलीय पीठ द्वारा तथ्यों और कानून के सुविचारित और सर्वसम्मत निष्कर्ष में हस्तक्षेप को उचित ठहराये और न ही संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश में।
इसने पिछले साल छह नवंबर को हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ गिरि द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह आदेश इस तथ्य के बावजूद दिया कि मंदिर के उस हिस्से पर लगभग 1968 से लगातार कब्जा है और किराया भी चुकाया जा रहा है, लेकिन उसने इस बात पर भी गौर किया कि याचिकाकर्ता अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है और धार्मिक एवं आध्यात्मिक जीवन व्यतीत कर रहा है।
पीठ ने कहा कि हम याचिकाकर्ता को मंदिर के उक्त परिसर का कब्जा प्रतिवादी/वादी मंदिर ट्रस्ट को सौंपने के लिए चार साल की अवधि देने के इच्छुक हैं, ताकि याचिकाकर्ता वैकल्पिक आवास तलाश सके।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक साधु मंदिर परिसर में रहेंगे। वह शांतिपूर्वक रहेंगे और मंदिर परिसर के विकास में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे। इसने यह भी निर्देश दिया गया कि मंदिर अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि याचिकाकर्ता द्वारा उपयोग किए जा रहे स्थान पर किसी तीसरे पक्ष को कब्जा करने की अनुमति न दी जाए और न ही उन्हें किसी प्रकार से परेशान किया जाए।
हाल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपलोड किए गए आदेश के अनुसार, गिरि मूल प्रतिवादी बाबा ब्रह्मानंदजी महाराज के कानूनी उत्तराधिकारी और प्रतिनिधि हैं, जिन्हें बाबुलनाथ मंदिर की मुख्य सीढ़ी के तल पर स्थित एक हिस्से का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी और कहा जाता है कि उनका उक्त स्थान पर कब्जा 1968 से है। यह परिसर 1927 में बाबा रामगिरि महाराज को किराए पर दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि बाबा रामगिरि महाराज अपनी मृत्यु तक विवादित परिसर में निवास करते रहे। जिसके बाद उनके शिष्य बाबा ब्रह्मानंदजी महाराज परिसर में किराएदार के रूप में रहने लगे। विवाद तब शुरू हुआ जब मंदिर के न्यासियों ने मुंबई की लघु न्यायालय में उन्हें बेदखल करने का अनुरोध करते हुए एक मुकदमा दायर किया।
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न्यायालय ने 18 अक्टूबर 1996 को मुकदमे का फैसला सुनाया और ब्रह्मानंदजी महाराज को वादी को विवादित परिसर का कब्जा सौंपने का निर्देश दिया। पीड़ित प्रतिवादी लघु वाद न्यायालय की अपीलीय पीठ के समक्ष उपस्थित हुआ, जिसने 22 जून, 2001 को उसकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद प्रतिवादी ने राहत के लिए मुंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
हाई कोर्ट में रिट याचिका लंबित रहने के दौरान, बाबा ब्रह्मानंदजी महाराज का निधन हो गया और जगन्नाथ गिरि को उनके कानूनी प्रतिनिधि के रूप में पक्षकार बनाया गया। उच्च न्यायालय ने हालांकि लघु वाद न्यायालय और अपीलीय पीठ द्वारा दिए गए तथ्यों और कानून संबंधी निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और छह नवंबर, 2025 को याचिका खारिज कर दी। (भाषा)
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