सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नोएडा से गिरफ्तार किए गए चीनी नागरिक लियू फेंगफेई को जमानत देने से इनकार कर दिया। फेंगफेई पर धोखाधड़ी और भारतीय पहचान से जुड़े दस्तावेजों में जालसाजी करने का आरोप है। हालांकि, अदालत ने मामले की सुनवाई में तेजी लाने और ट्रायल को जल्द से जल्द पूरा करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने फेंगफेई की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामले की सुनवाई पहले से चल रही है। अदालत ने निर्देश दिया कि मुकदमे की कार्यवाही में तेजी लाई जाए और इसे जल्द से जल्द, बेहतर होगा कि छह महीने के भीतर, पूरा किया जाए।
मां की गंभीर बीमारी का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान फेंगफेई की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उसके परिवार में गंभीर चिकित्सकीय आपात स्थिति है। उसकी मां गंभीर रूप से बीमार हैं और अस्पताल में भर्ती हैं। वकील ने कहा कि फेंगफेई अपनी बीमार मां से मिलने के लिए चीन के हेनान प्रांत के नानयांग शहर जाना चाहता है।
केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने जमानत का विरोध करते हुए बताया कि मामले में ट्रायल पहले ही शुरू हो चुका है और 36 गवाहों के बयान दर्ज किए जाने हैं।
पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि जब मुकदमे की सुनवाई चल रही है, ऐसे में पारिवारिक चिकित्सा आपात स्थिति के आधार पर आरोपी को जमानत देना मुश्किल है।
जून में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को किया था पक्षकार
इससे पहले 5 जून को सुप्रीम कोर्ट ने फेंगफेई की उस दलील पर विचार किया था, जिसमें उसने अपनी गंभीर रूप से बीमार मां से मिलने के लिए मानवीय आधार पर चीन जाने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने उस समय उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में लिया था कि भारत और चीन के बीच कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं है। इसी वजह से अदालत ने केंद्र सरकार को विदेश मंत्रालय के माध्यम से मामले में अतिरिक्त पक्षकार बनाया था।
उस समय अदालत ने स्पष्ट किया था कि केंद्र को पक्षकार बनाने का उद्देश्य केवल यह पता लगाना है कि क्या ऐसा कोई रास्ता निकाला जा सकता है, जिससे फेंगफेई कुछ समय के लिए अपनी बीमार मां के पास जा सके।
इलाहाबाद हाईकोर्ट भी खारिज कर चुका है जमानत
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी 24 फरवरी को फेंगफेई की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि भारत और चीन के बीच प्रत्यर्पण संधि नहीं है। ऐसे में अगर कोई विदेशी नागरिक भारत से बाहर चला जाता है और वापस नहीं लौटता, तो उसके द्वारा दी गई जमानत या सुरक्षा प्रभावी नहीं रह जाएगी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर कोई विदेशी आरोपी भारतीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर चला जाता है, तो उसके खिलाफ चल रही आपराधिक न्याय प्रक्रिया ठप पड़ सकती है। अदालत के मुताबिक, विदेशी नागरिकों की भारत में मौजूदगी सुनिश्चित करना पहले से ही जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है।
हाईकोर्ट ने माना था कि भारत और चीन के बीच प्रत्यर्पण संबंधी कोई संधि नहीं होने के कारण विदेश जाने की अनुमति देना जोखिम भरा हो सकता है। ऐसी स्थिति में आरोपी के वापस भारत नहीं लौटने और मुकदमे की कार्यवाही से बच निकलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते हुए ट्रायल को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया है और इसे छह महीने के भीतर पूरा किए जाने की उम्मीद जताई है।
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केरल हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में महिला की सास को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बहू द्वारा सास पर लगाए गए आरोप स्पष्ट और गंभीर हैं, जिनकी सच्चाई का फैसला ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
