सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एसिड अटैक के सभी पीड़ितों को सरकारी नौकरी उपलब्ध कराने की नीति बनाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि नौकरी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती, तो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पीड़ितों को जीवन निर्वाह भत्ता देने की नीति बनानी चाहिए।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को कारण बताना होगा कि सरकारी विभागों/एजेंसियों में रोजगार के माध्यम से एसिड हमलों के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कोई योजना क्यों नहीं बनाई गई है। पीठ ने आगे कहा, “यदि एसिड हमलों के पीड़ितों को सरकारी रोजगार प्रदान करने में कोई रसद संबंधी समस्याएं हैं, तो राज्य सरकारें एसिड हमले के पीड़ितों को जीवन निर्वाह भत्ता देने के लिए एक नीति बना सकती हैं।”

शीर्ष अदालत ने यह निर्देश एसिड अटैक पीड़िता शाहीन मलिक के मामले की सुनवाई के दौरान दिया। मलिक, जिनका प्रतिनिधित्व अदालत के अनुरोध पर वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने निःशुल्क किया। उन्होंने अपनी याचिका में उल्लेख किया कि एसिड अटैक पीड़ितों को अक्सर बैंक खाते खोलने, आधार कार्ड प्राप्त करने, संपत्ति पंजीकृत या अपडेट करने और मोबाइल सिम कार्ड खरीदने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है

इसके अलावा, अदालत में एसिड अटैक पीड़ितों के लिए केवाईसी पंजीकरण की समस्याओं का मुद्दा भी उठाया गया। बताया गया कि पीड़ितों को केवाईसी पंजीकरण में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि इस प्रक्रिया में जीवित होने का प्रमाण देने के लिए आंखों की पुतलियों, पलक झपकाने और उंगलियों के निशान जैसी डिजिटल जानकारी दर्ज करनी पड़ती है, जो अक्सर एसिड अटैक पीड़ितों के लिए असंभव हो जाता है।

इससे पहले, एसिड अटैक की कई पीड़ितों ने सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को समावेशी और वैकल्पिक डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया अपनाने का आदेश देने का अनुरोध किया था, क्योंकि उन्हें कई कठिनाइयों और बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

इस साल की शुरुआत में कोर्ट ने एसिड हमले के मामलों में कड़ी सजा की आवश्यकता पर बल दिया और सुझाव दिया कि आरोपियों की संपत्ति जब्त करके पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए नीलाम की जानी चाहिए । ये टिप्पणियां शाहीन मलिक की उसी याचिका की सुनवाई के दौरान आईं, जिन्होंने निचली अदालत द्वारा उनके मामले में आरोपी को बरी किए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था।

सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुझाव दिया कि केंद्र को एसिड हमले के आरोपियों के लिए सजा को और सख्त बनाना चाहिए, क्योंकि ऐसे अपराधों में सुधारात्मक दृष्टिकोण की कोई गुंजाइश नहीं होती है। चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें कुछ असाधारण कदम उठाने होंगे। जब तक सजा दर्दनाक न हो, ये ऐसे मामले हैं जहां सुधारवादी सिद्धांत का कोई स्थान नहीं है। पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए संपत्ति जब्त करके क्यों नहीं बेची जा सकती?

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कॉलेजियम सिस्टम की पारदर्शिता पर उठाए सवाल

जस्टिस दत्ता ने न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर होने वाली बातचीत को महज आंकड़ों तक सीमित करने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की बात आती है तो मैं संख्या के आधार पर फैसला नहीं करूंगा। पढ़ें पूरी खबर।