Supreme Court News: संभल हिंसा मामले के मुख्य आरोपी मुल्ला अफ़रोज़ को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत अफ़रोज़ की निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अफरोज को राहत देने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार पर दस लाख रुपये का जुर्माना भी लगा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज के इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें अफ़रोज़ के खिलाफ जारी हिरासत के आदेश को बरकरार रखा गया था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार केवल पुलिस हिरासत में दिए गए किसी आरोपी के कबूलनामे को आधार बनाकर निवारक हिरासत का आदेश पारित नहीं कर सकती।
NSA को लेकर योगी सरकार पर जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी तरीके से NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया है। यह पूरा मामला संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के अदालती आदेश पर हुए सर्वेक्षण के बाद भड़की हिंसा से जुड़ा है, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी। घटना के लगभग 54 दिन बाद पुलिस ने मुल्ला अफ़रोज़ को हिरासत में लिए गए बयान के आधार पर गिरफ्तार किया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी थी नियमित जमानत
हालांकि बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत दे दी थी, लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन ने 13 अक्टूबर 2025 को उनके खिलाफ एनएसए के तहत कार्रवाई करते हुए हिरासत का आदेश जारी कर दिया था। याचिकाकर्ता अफ़रोज़ के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि पुलिस हिरासत में दिया गया कबूलनामा भारतीय साक्ष्य कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है।
अफरोज के वकील ने कहा कि सिर्फ कई एफआईआर दर्ज होना ही किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल जेल में रखने का आधार नहीं बन सकता। याचिकाकर्ता की ओर से ‘रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ और ‘अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य’ के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि ठोस सबूतों के बिना केवल दोबारा अपराध करने की आशंका के आधार पर किसी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी नहीं छीनी जा सकती।
राज्य सरकार ने बचाव में क्या कहा?
दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिरासत के आदेश का बचाव करते हुए अदालत में दावा किया कि याचिकाकर्ता से सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की प्रबल संभावना थी। राज्य के वकीलों का तर्क था कि यदि उपलब्ध सामग्री से हिंसा की संभावना दिखती है, तो निवारक हिरासत जायज है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस कस्टडी में दिए बयानों की कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल उठाए और इसे राज्य सरकार की ‘आत्म-संतुष्टि’ का कमजोर आधार माना।
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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रैफिक चालान की वसूली को लेकर अधिकारियों को जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत बताई है। सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने सुझाव दिया कि अगर लोग ट्रैफिक चालान नहीं भर रहे हैं तो इसकी वसूली के लिए बिजली बिल जैसे दूसरे सरकारी बकाये के साथ रकम जोड़ने जैसे तरीकों पर विचार किया जा सकता है। पढ़िए पूरी खबर…
