राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने तमिलनाडु तट पर ओलिव रिडले कछुओं (Olive Ridley Turtles) की मौत की बढ़ती संख्या को लेकर संज्ञान लिया है। एनजीटी ने इसको लेकर राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य उपायों को सख्ती से लागू करने को कहा है।
जस्टिस पुष्पा सत्यनारायण (Judicial Member) और डॉ. प्रशांत गर्गावा (expert member) की पीठ ने तमिलनाडु आंध्र प्रदेश से महीनों की निगरानी रिपोर्टों के बाद लुप्तप्राय प्रजातियों से संबंधित एक स्वतः संज्ञान याचिका पर सुनवाई की।
NGT ने 17 फरवरी को कहा कि यह उचित होगा कि अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों का सख्ती से पालन करने और इस संबंध में जारी किए गए मानक परिचालन प्रक्रियाओं (एसओपी), सरकारी आदेशों और ज्ञापनों का पालन करने का निर्देश दिया जाए, ताकि लुप्तप्राय ऑलिव रिडले कछुओं की और मौतें न हों।
एनजीटी का यह आदेश काफी हद तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा अर्नव सिन्हा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (सिविल अपील संख्या 288 ऑफ 2021) मामले में पहले जारी किए गए निर्देशों पर आधारित था। उस मामले में शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटों पर इसी तरह की कछुओं की मौतों का संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधीन एक राष्ट्रीय नोडल अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य कर दी थी ।
16 जनवरी, 2025 की एक समाचार रिपोर्ट के बाद एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया गया था। जिसमें कहा गया था कि चेन्नई तट पर 350 मृत कछुए बहकर आ गए थे। न्यूज पेपर में छपी खबर के अनुसार, कुछ ही दिनों में मरने वालों की संख्या 500 का आंकड़ा पार कर गई थी। चिंताजनक खबरों का संज्ञान लेते हुए, एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की और केंद्र सरकार, तमिलनाडु सरकार, तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, मत्स्य पालन और वन विभागों और बाद में आंध्र प्रदेश राज्य से विस्तृत जवाब मांगे।
प्रारंभिक आकलन से संकेत मिलता है कि अधिकांश कछुए संभवतः मछली पकड़ने के जालों में फंसने के बाद मर गए। विशेष रूप से स्क्विड के जालों में जो शाम को तट से लगभग तीन समुद्री मील दूर बिछाए गए थे और अगली सुबह निकाले गए थे। अगर कछुए रात भर जाल में फंसे रहते, तो जाल वापस खींचने से पहले ही वे डूब जाते। एनजीटी ने कहा कि ऑलिव रिडले कछुआ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची I की प्रजाति है, जिसका अर्थ है कि इसे भारत में उच्चतम स्तर का कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने बाबर के नाम पर मस्जिद पर बैन की मांग ठुकराई
सुप्रीम कोर्ट ने देश में बाबर या बाबरी नाम से मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद राहत देने से इनकार किया।
