Sohrabuddin Encounter Case: बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को 2018 के एक स्पेशल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। स्पेशल कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति के कथित फर्जी मुठभेड़ और 2005-06 में शेख की पत्नी कौसर बी की हत्या के मामले में गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के 21 पुलिसकर्मियों सहित सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की खंडपीठ ने बरी करने के फैसले को बरकरार रखा और शेख के भाइयों रुबाबुद्दीन और नायबुद्दीन शेख द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया। पीठ ने एक मौखिक आदेश जारी कर कहा कि अपीलें खारिज कर दी गई हैं और विस्तृत फैसला बाद में सुनाया जाएगा।
शेख के भाइयों द्वारा दायर अपीलों में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी या वैकल्पिक रूप से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 386(ए) के तहत पुनर्विचार के लिए निर्देश देने की अपील की गई थी।
ये अपीलें 2019 से ही कोर्ट के समक्ष लंबित थीं और इन पर 2025 में फैसला सुनाया जाना था। दोनों भाइयों ने ‘परिवार के सदस्यों को खोने वाले पीड़ितों’ की हैसियत से अपील दायर की। उन्होंने तर्क दिया था कि मुकदमा मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण था और इसे इस तरह चलाया गया था जिससे न्याय के उद्देश्य ही विफल हो गए।
उन्होंने यह तर्क दिया कि स्पेशल जज ने अपना निर्णय निराधार मान्यताओं और साक्ष्यों के स्पष्ट रूप से गलत मूल्यांकन पर आधारित किया। अपील में एक प्रमुख शिकायत अभियोजन पक्ष द्वारा उन मजिस्ट्रेटों को तलब करने में विफलता थी जिनके समक्ष प्रमुख विरोधी गवाहों ने पहले अपने बयान दर्ज कराए थे।
हाई कोर्ट में याचिका दायर करने से पहले रुबाबुद्दीन ने गृह मंत्रालय, सीबीआई निदेशक और कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखकर सरकार से फैसले को आधिकारिक रूप से चुनौती देने का आग्रह किया था। इस बीच, सीबीआई ने हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान कहा कि उसने फैसले को स्वीकार कर लिया है और अपील में इसे चुनौती देने का कोई निर्णय नहीं लिया है।
यह मामला 23 नवंबर, 2005 की एक घटना से जुड़ा है। जब वांछित अपराधी सोहराबुद्दीन शेख को कथित तौर पर कौसर बी और प्रजापति के साथ हैदराबाद से सांगली जा रही एक लग्जरी बस से अगवा कर लिया गया था।
सीबीआई ने दावा किया कि शेख और प्रजापति को बाद में पुलिस द्वारा किए गए फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया गया, जबकि कौसर बी की हत्या कर दी गई और उसके शव को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगा दिया गया। इस मामले में मौजूदा केंद्रीय मंत्री अमित शाह भी आरोपी थे।
यह मामला गुजरात में दर्ज किया गया था। हालांकि, सीबीआई के अनुरोध पर 2012 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया था।
इस मुकदमे की अध्यक्षता कई न्यायाधीशों ने की। जिनमें न्यायाधीश बी.एच. लोया भी शामिल थे, जिनकी 2014 में मुकदमे के बीच में ही मृत्यु हो गई थी, और न्यायाधीश एम.बी. गोसावी भी शामिल थे, जिन्होंने दिसंबर 2014 में शाह को इस मामले से बरी कर दिया था।
इसके बाद अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला। 21 दिसंबर 2018 को सीबीआई के स्पेशल जज एसजे शर्मा ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया, जिनमें गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के सेवारत और सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी शामिल थे।
ट्रायल कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष साजिश और हत्या के आरोपों को संतोषजनक ढंग से साबित करने में विफल रहा। मुकदमे की सुनवाई के दौरान 210 गवाहों से पूछताछ की गई, लेकिन अभियोजन पक्ष का मामला तब धराशायी हो गया जब उनमें से 92 गवाह मुकर गए।
अपने 358 पृष्ठों के फैसले में ट्रायल जज ने मृतक के परिवार के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन निर्णायक सबूतों की गंभीर कमी का हवाला दिया। जज ने आगे कहा था कि आरोपी को केवल नैतिक या संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
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अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने दावा किया था कि सोहराबुद्दीन को नवंबर 2005 में गुजरात में एक फेक एनकउंटर में मारा गया था। उनकी पत्नी की हत्या भी उसी महीने में हुई थी और प्रजापति की हत्या दिसंबर 2006 में हुई थी।
इस मामले की जांच पहले गुजरात की आतंकवाद विरोधी दस्ते और सीआईडी (अपराध) द्वारा की जा रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिए जाने के बाद मुकदमे की सुनवाई मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफर कर दी गई थी।
स्पेशल कोर्ट ने इससे पहले तत्कालीन गुजरात गृह मंत्री अमित शाह , वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी दिनेश एमएन, राजकुमार पांडियन और डीजी वंजारा तथा राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया सहित 16 आरोपियों को बरी कर दिया था।
स्पेशल कोर्ट के जज एस.जे. शर्मा ने 21 दिसंबर, 2018 को कहा था कि अभियोजन पक्ष साजिश साबित करने में विफल रहा है और उन्होंने टिप्पणी की कि सीबीआई ने “राजनीतिक नेताओं को किसी न किसी तरह फंसाने के उद्देश्य से पूर्व नियोजित सिद्धांत और स्क्रिप्ट” के तहत जांच की थी। न्यायाधीश शर्मा ने यह भी टिप्पणी की कि जो गवाह मुकर गए थे, उन्होंने अदालत के समक्ष “सच” कहा और बताया कि सीबीआई ने उनके बयान गलत तरीके से दर्ज किए थे।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपीलें अप्रैल 2019 में दायर की गई थीं, लेकिन हाई कोर्ट ने दिसंबर 2025 से अंतिम सुनवाई की और 16 जनवरी को इसे समाप्त किया, जब उसने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। जिसे गुरुवार को सुनाया गया।
अपनी अपील में सोहराबुद्दीन के भाइयों ने (जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता गौतम तिवारी कर रहे थे) दावा किया कि विशेष न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणियां और निष्कर्ष साक्ष्यों के विपरीत थे। उन्होंने तर्क दिया कि प्रजापति के सह-कैदियों के बयान, जिनसे पता चलता है कि उसे अपनी जान का खतरा था, निचली अदालत द्वारा ध्यान में नहीं रखे गए।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) अनिल सिंह द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए सीबीआई ने हाई कोर्ट को बताया कि उसने 2018 के फैसले को स्वीकार कर लिया है और इसके खिलाफ अपील दायर करने का निर्णय नहीं लिया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अमित देसाई समेत बरी किए गए आरोपियों के बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि बरी करने के फैसले को पलटने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी दावा किया कि घटना स्थल और समय पर आरोपियों की उपस्थिति साबित करने के लिए “कोई प्रत्यक्ष प्रमाण या परिस्थितिजन्य प्रमाण भी नहीं है। इसलिए अपीलें खारिज की जानी चाहिए।
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