गुजरात हाई कोर्ट ने 2002 के दंगों से जुड़े हिंसा के दो अलग-अलग मामलों में आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले बरकरार रखा है। इन मामलों में पीड़ितों को “जिंदा आग में फेंक दिए जाने” और भीड़ द्वारा उनका पीछा किए जाने के आरोप हैं। न्यायालय ने राज्य द्वारा 2003 में और एक व्यक्तिगत याचिकाकर्ता द्वारा 2007 में दायर अपीलों को खारिज कर दिया है।

18 अप्रैल, 2026 को दिए गए एक फैसले में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस निर्जर देसाई और जस्टिस डीएन रे की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। राज्य सरकार ने अपनी अपील में वडोदरा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 2003 में पारित एक आदेश को चुनौती दी गई थी। जिसमें 28 फरवरी, 2002 को वडोदरा के खोडियार नगर क्षेत्र में शमसुद्दीन उर्फ कसमखान नामक व्यक्ति को “जिंदा आग में फेंकने” के आरोपी पांच व्यक्तियों को बरी कर दिया गया था।

फैसले में कहा गया है कि शमसुद्दीन उर्फ कसमखान के पड़ोसी की शिकायत पर आधारित एफआईआर, 27 फरवरी, 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन को जलाने की घटना के बाद राज्य भर में व्यापक सांप्रदायिक अशांति से संबंधित थी।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि इन पांच आरोपियों ने करीब 200 अन्य लोगों के साथ मिलकर एक अवैध भीड़ बनाई थी। इस भीड़ का मकसद मृतक की हत्या करना और मुस्लिम बस्तियों तथा दुकानों में आग लगाना था, ऐसा फैसले में बताया गया है।

मामले के अनुसार, 28 फरवरी की रात करीब 11 बजे भीड़ जबरन शमसुद्दीन के घर में घुस गई और उसमें आग लगा दी। आरोप है कि भीड़ ने शमसुद्दीन को पकड़ लिया। उसके साथ मारपीट की और अंत में उसे जिंदा ही आग में फेंक दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।

राज्य ने तर्क दिया कि दोषमुक्ति का विवादित निर्णय और आदेश कानून और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के विपरीत है और इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए। राज्य सरकार ने दावा किया कि निचली अदालत ने यह मानने में गंभीर त्रुटि की है कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि निचली अदालत ने इस तथ्य पर अनावश्यक जोर दिया है कि जांच अधिकारी ने घटनास्थल से मृतक की हड्डियां अगले दिन बरामद नहीं कीं… वास्तव में, (हड्डियां) सात दिनों के बाद बरामद की गईं। राज्य ने न्यायालय से आग्रह किया कि घटना की प्रकृति को देखते हुए, जिसमें दुकानों और घरेलू सामानों को बड़े पैमाने पर जलाया गया था, यह स्वाभाविक था कि मृतक के अवशेष अगले दिन घटनास्थल पर तुरंत नहीं मिल पाए होंगे।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि साक्ष्य रिकॉर्ड अभियुक्तों की बरी करने के विरुद्ध राज्य के तर्क का समर्थन नहीं करता है। उच्च न्यायालय ने फोरेंसिक डॉक्टर के इस बयान पर गौर किया कि उक्त हड्डियों से यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि वे पुरुष की हैं या महिला की और यह कि उनके द्वारा जांच की गई हड्डियों को मृतक से निर्णायक रूप से नहीं जोड़ा जा सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि शिकायतकर्ता ने दंगाइयों की पहचना नहीं कर सका। क्योंकि घटना रात के अंधेरे में घटी थी और इसलिए वह किसी भी व्यक्ति की पहचान करने की स्थिति में नहीं था।

राज्य ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने आरोपियों के नाम स्पष्ट रूप से बताए थे और अदालत में उनकी पहचान भी की थी। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि चिकित्सीय राय केवल सलाहकारी प्रकृति की होती है और प्रत्यक्षदर्शी के प्रत्यक्ष और ठोस बयान को खारिज नहीं कर सकती।

यह कहते हुए कि हाई कोर्ट अपीलीय न्यायालय की भूमिका में बरी करने के फैसले को दोषसिद्धि में बदलने के लिए अपना स्वयं का दृष्टिकोण प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, जब तक कि निष्कर्ष गलत न हों। पीठ ने माना कि राज्य यह बताने में सक्षम नहीं रहा है कि निचली अदालत के निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के विपरीत, स्पष्ट रूप से गलत, स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण या स्पष्ट रूप से अस्थिर कैसे थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन संदेह से परे आरोप सिद्ध करने में विफल रहा है और सेशन कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ राज्य की अपील खारिज की जाती है।

पंचमहल मामला

हाई कोर्ट ने निचली अदालत के निष्कर्षों में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता न मानते हुए पंचमहल के 2002 के एक दंगे मामले में आरोपियों की बरी होने को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया। जिसमें रामेशारा गांव में दो लोगों की मौत हो गई थी।

29 अप्रैल को दिए गए एक फैसले में गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एच.डी. सुथार ने इनायत अली मकरानी द्वारा दायर अपील को इस आधार पर खारिज कर दिया कि निचली अदालत के फैसले में कानून के अधिकार क्षेत्र की कोई स्पष्ट खामी या त्रुटि नहीं थी। मकरानी ने स्वयं को मृतक व्यक्तियों का भतीजा बताया था।

यह मामला गोधरा कांड के बाद हुई हिंसा से संबंधित है। जब 2 मार्च, 2002 को एक बड़ी भीड़ ने कथित तौर पर एक गांव पर हमला किया, घरों और दुकानों में आग लगा दी और भागने की कोशिश कर रहे दो व्यक्तियों – यार मोहम्मद हाजी मेहरबान अली मकरानी और उनकी पत्नी हमीदाबीबी की हत्या कर दी। हलोल पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई और भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत, जिनमें डकैती, हत्या, आगजनी और आपराधिक साजिश शामिल हैं, आरोप लगाए गए।

हाई कोर्ट ने निचली अदालत के तर्क का समर्थन करते हुए कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। फैसले में आगे कहा गया कि “यद्यपि अभियोजन पक्ष ने दस आरोपियों की संलिप्तता का आरोप लगाया था, लेकिन केवल तीन हथियार बरामद हुए और घटनास्थल पर किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया।

अदालत ने यह भी पाया कि गवाह बरामद किए गए हथियारों की पहचान नहीं कर पाए और यहां तक कि ‘मुद्दामाल’ (जब्त सामान) की भी सही पहचान नहीं हो सकी। अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी डकैती या लूट में शामिल थे, न ही यह साबित कर सका कि उन्होंने कोई अवैध भीड़ बनाई थी या घटना की पहले से योजना बनाई थी।

‘किसी आदेश की जरूरत नहीं’, सुप्रीम कोर्ट से भी TMC को झटका, चुनाव आयोग के फैसले को दी थी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को टीएमसी की उस याचिका पर सुनावई की, जिसमें ममता की पार्टी ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर रोक लगाने की मांग की है। जिसमें मतगणना पर्यवेक्षकों के तौर पर सिर्फ केंद्रीय कर्मचारी या PSU स्टाफ रखने की बात कही गई है। TMC ने इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने आपत्ति खारिज करते हुए कहा था कि काउंटिंग स्टाफ की नियुक्ति चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसमें कोई अवैधता नहीं है। पढ़ें पूरी खबर।