दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को अभिनेता राजपाल यादव से जुड़े चेक बाउंस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। राजपाल यादव को इस मामले के सिलसिले में इसी साल कुछ समय के लिए तिहाड़ जेल में रखा गया था। मामले की सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने की। जिन्होंने बकाया राशि चुकाने के संबंध में अभिनेता के रुख में विरोधाभासों पर चिंता व्यक्त की। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि मुझे अपने सवालों के जवाब नहीं मिल रहे हैं। लिखित वचन में कुछ और कहा गया था, और अब आप कुछ और कह रहे हैं।

मुझे पांच बार और जेल भेजो- राजपाल यादव

शिकायतकर्ता का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता अवनीत सिंह सिक्का ने तर्क दिया कि राजपाल यादव ने पहले ही अपनी सजा स्वीकार कर ली है। अब वह दायित्व से बच नहीं सकते। उन्होंने बताया कि 2024 में दायर पुनरीक्षण याचिका में 1,894 दिनों की अस्पष्ट देरी हुई थी और इसलिए इसे माफ करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सजा पूरी करने से वित्तीय दायित्व समाप्त नहीं हो जाता, और बार-बार भुगतान के आश्वासनों का पालन नहीं किया गया, जिसके कारण परक्राम्य लिखत अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई।

बता दें, परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) भारत का एक प्रमुख कानून है जो चेक, वचन पत्र (Promissory Notes) और विनिमय पत्र (Bills of Exchange) जैसे वित्तीय दस्तावेजों के हस्तांतरण और उपयोग को विनियमित करता है। यह अधिनियम व्यापार में सुरक्षा और कानूनी मान्यता सुनिश्चित करता है, विशेषकर चेक बाउंस होने के मामलों (धारा 138) में।

अदालत ने बातचीत के जरिए समाधान की संभावना तलाशी और दोनों पक्षों को समझौते पर विचार करने को कहा। शिकायतकर्ता ने 6 करोड़ रुपये को पूर्ण और अंतिम भुगतान के रूप में स्वीकार करने की इच्छा जताई। हालांकि, राजपाल यादव ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से पेश होते हुए राजपाल यादव ने अदालत को बताया कि वे पहले ही काफी आर्थिक तंगी झेल चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पांच फ्लैट बेच दिए हैं और आंशिक भुगतान कर दिया है। उन्होंने कहा कि मैं भावुक नहीं हूं, मुझे पांच बार और जेल भेज दो।

मामले को आगे बढ़ाने की कोशिश में अदालत ने एक तय समय के अंदर 3 करोड़ रुपये चुकाने की व्यवस्थित योजना सुझाई। साथ ही यह साफ किया कि यह सिर्फ मदद के लिए दिया गया सुझाव है। लेकिन इस पर दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन पाई। जज ने कार्यवाही के दौरान व्यवहार पर नाराजगी भी जताई और कहा, “अगर जज आपके साथ अच्छा व्यवहार कर रहा है, तो उसे कमजोर मत समझिए।” उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह से अदालत का कीमती समय बर्बाद हो रहा है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद साल 2010 से शुरू हुआ था, जब राजपाल यादव ने अपनी फिल्म ‘अता पता लापता’ के लिए मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 5 करोड़ रुपये उधार लिए थे। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही, जिससे नुकसान हुआ और मामला लंबे समय तक विवाद में चला गया। साल 2018 में ट्रायल कोर्ट ने चेक बाउंस मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए 6 महीने की जेल की सजा सुनाई, जिसे 2019 में भी बरकरार रखा गया। इसके बाद से उनकी देनदारी बढ़कर लगभग 9 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।

हाई कोर्ट ने पहले उनकी सजा पर रोक लगा दी थी, क्योंकि उन्होंने भरोसा दिलाया था कि वह विवाद सुलझा लेंगे। अदालत ने इस मामले को सुलह (मेडिएशन) के लिए भी भेजा था, लेकिन अदालत ने पाया कि बार-बार किए गए वादे पूरे नहीं हुए, जिसमें 2.5 करोड़ रुपये किस्तों में देने का प्रस्ताव भी शामिल था।

फरवरी 2026 में शर्तों का पालन न करने पर अदालत ने राजपाल यादव को सरेंडर करने का आदेश दिया और उन्हें और समय देने की मांग भी ठुकरा दी। उन्होंने 5 फरवरी को आत्मसमर्पण किया और 1.5 करोड़ रुपये जमा करने के बाद उन्हें अंतरिम राहत मिलने तक हिरासत में रहना पड़ा।

हाई कोर्ट के अंदर महिला सहकर्मी को थप्पड़ मारने का आरोप, जज ने रांची के वकील को ठहराया दोषी

रांची की एक सिविल कोर्ट ने सोमवार को अधिवक्ता महेश तिवारी दोषी ठहराया है। मामला 2012 का है। जब झारखंड हाई कोर्ट परिसर के अंदर एक महिला वकील पर उन्होंने हमला किया था। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसा जगाती है। पढ़ें पूरी खबर।