सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को जातिसूचक गालियां किसी बंद कमरे के अंदर दी गई हैं और वहां आम लोग मौजूद नहीं थे या उन गालियों को सुन नहीं सकते थे, तो इसे SC/ST एक्ट के तहत “पब्लिक व्यू” यानी सार्वजनिक दृष्टि में किया गया अपराध नहीं माना जाएगा।
लॉ बीट की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक स्कूल मैनेजर के खिलाफ दर्ज SC/ST एक्ट की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) के मामले को रद्द करते हुए यह अहम टिप्पणी की।
शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि “पब्लिक व्यू” का मतलब केवल यह नहीं है कि घटना किसी स्कूल, दफ्तर या सार्वजनिक परिसर में हुई हो। यह साबित होना जरूरी है कि जातिसूचक टिप्पणी ऐसे हालात में की गई हो, जहां आम लोग उसे देख या सुन सकते हों।
क्या मामला था?
मामले में आरोप था कि स्कूल मैनेजर ने एक छात्र के अभिभावक के साथ मारपीट की और जातिसूचक गालियां दीं, लेकिन कोर्ट ने पाया कि एफआईआर के मुताबिक, घटना स्कूल के एक बंद कमरे में हुई थी। जांच अधिकारी के साइट प्लान में भी घटना का स्थान कमरे के अंदर दिखाया गया था, जहां न तो कोई खिड़की थी और न ही सार्वजनिक पहुंच।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि कथित जातिसूचक गालियां आम लोगों की मौजूदगी में दी गई थीं या किसी ने उन्हें सुना था।
अदालत ने यह भी पाया कि एफआईआर और शिकायतकर्ता के बयान में किसी खास जातिसूचक शब्द या टिप्पणी का जिक्र नहीं किया गया है। आरोप केवल सामान्य रूप से लगाए गए हैं। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से अधिकतम इतना ही पता चलता है कि दोनों पक्षों के बीच झगड़ा और मारपीट हुई थी, लेकिन किसी विशेष जातिसूचक टिप्पणी का स्पष्ट आरोप नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि स्कूल परिसर में मौजूद गवाहों ने भी यह नहीं कहा कि वे उस कमरे के अंदर मौजूद थे या उन्होंने कथित जातिसूचक गालियां सुनी थीं। इसलिए केवल स्कूल परिसर में मौजूद होना “पब्लिक व्यू” की शर्त पूरी नहीं करता। इन्हीं आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल मैनेजर के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामला रद्द कर दिया।
यूपी गैंगस्टर एंड एंटी सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून “स्टिलबॉर्न” यानी जन्म से ही दोषपूर्ण है, क्योंकि इसमें किसी नए अपराध को परिभाषित किए बिना सजा का प्रावधान कर दिया गया है। पढ़ें पूरी खबर।
