यूपी गैंगस्टर एंड एंटी सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून “स्टिलबॉर्न” यानी जन्म से ही दोषपूर्ण है, क्योंकि इसमें किसी नए अपराध को परिभाषित किए बिना सजा का प्रावधान कर दिया गया है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि कानून में केवल “गैंग” और “गैंगस्टर” की परिभाषा दी गई है, जबकि जिन गतिविधियों को इसमें शामिल किया गया है, वे पहले से ही IPC और अन्य आपराधिक कानूनों के तहत दंडनीय हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा किसी अलग अपराध का सृजन किए बिना सीधे सजा का प्रावधान करना कानून की गंभीर खामी है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में मशहूर लेखक जॉर्ज ऑरवेल का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि हिंसा रोकने के नाम पर बनाया गया यह कानून कई मामलों में निर्दोष और अनजान नागरिकों के खिलाफ हिंसा और दमन को बढ़ावा देता नजर आता है।

शीर्ष अदालत ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट, 1986 को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि इस कानून में जिन अपराधों का जिक्र है,वे पहले से ही भारतीय दंड संहिता (IPC) और अन्य कानूनों के तहत दंडनीय हैं। ऐसे में यह कानून कोई नया अपराध परिभाषित नहीं करता, बल्कि केवल व्यक्ति को “गैंगस्टर” का दर्जा देता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि अपहरण, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी समेत एक्ट में सूचीबद्ध सभी गतिविधियां पहले से ही दूसरे कानूनों के तहत अपराध हैं। यूपी गैंगस्टर एक्ट केवल इन अपराधों में शामिल व्यक्ति को “गैंगस्टर” घोषित कर सजा का प्रावधान करता है।

कोर्ट ने कहा कि 1986 का यह कानून कोई अलग अपराध नहीं बनाता, बल्कि सिर्फ अपराध में शामिल व्यक्ति की स्थिति को “गैंगस्टर” के रूप में परिभाषित करता है। यही इसकी सबसे बड़ी कानूनी खामी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ दो अधिवक्ताओं- शिव प्रताप सिंह और हिमांशु श्रीवास्तव के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत चल रही कार्रवाई को रद्द कर दिया।

फतेहगढ़ बार एसोसिएशन चुनाव से जुड़ा है मामला

शिव प्रताप सिंह का मामला फतेहगढ़ बार एसोसिएशन चुनाव विवाद से जुड़ा था। चुनावी विवाद और उससे जुड़े अनुशासनात्मक व आपराधिक मामलों के बाद उन्हें कथित गैंग का सदस्य बताकर गैंगस्टर एक्ट के तहत नामजद किया गया था।

वहीं, दूसरे मामले में हिमांशु श्रीवास्तव, उनके भाई और उनके पिता के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई थी। आरोप था कि उनके पिता कथित गैंग के सरगना हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में कार्रवाई रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद दोनों वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

शीर्ष अदालत ने दोनों अपीलों की एक साथ सुनवाई की और कहा कि दोनों मामलों में मुख्य सवाल यूपी गैंगस्टर एक्ट और 2021 के नियमों के तहत की गई कार्रवाई की वैधता से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों वकीलों को राहत देते हुए उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही रद्द कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत बनाए जाने वाले “गैंग चार्ट” सिस्टम पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि 2021 के नियमों के तहत पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी किसी व्यक्ति को “गैंगस्टर” घोषित करने की प्रक्रिया तय करते हैं, जबकि यह काम कानून बनाने वाली संस्था यानी विधायिका का है।

कोर्ट ने बताया कि मौजूदा नियमों के तहत थाने स्तर पर गैंग चार्ट तैयार किया जाता है, जिसे अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की सिफारिश के साथ आगे भेजा जाता है। इसके बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और जिला प्रशासन की मंजूरी के बाद व्यक्ति को गैंगस्टर के तौर पर चिन्हित किया जाता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि किसी कृत्य को अपराध घोषित करना और उसके लिए सजा तय करना विधायिका का विशेष अधिकार है। इसे अधीनस्थ नियमों या कार्यपालिका के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ गैंग चार्ट में नाम शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी, लंबी न्यायिक हिरासत, मुकदमा और सजा तक का रास्ता खुल जाता है। अदालत ने इस व्यवस्था की तुलना अंग्रेजी कहावत “Give a dog a bad name and hang him” से की, जिसका अर्थ है किसी को बदनाम कर पहले ही दोषी मान लेना।

अदालत ने टिप्पणी की कि जब कार्यपालिका किसी व्यक्ति को पहले ही “गैंगस्टर” घोषित कर देती है, तो उसके बाद चलने वाला मुकदमा महज औपचारिकता बनकर रह जाता है और फैसले का परिणाम पहले से तय दिखाई देता है।

पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) और इस सिद्धांत पर भी भरोसा किया कि किसी भी व्यक्ति को तब तक दंडित नहीं किया जा सकता जब तक कि कानून द्वारा कोई अपराध सृजित न किया गया हो।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने यूपी गैंगस्टर एक्ट की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं दिया है और न ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल बेंच के पुराने फैसले को रद्द किया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि महाराष्ट्र और गुजरात के संगठित अपराध विरोधी कानूनों का जिक्र केवल तुलना के लिए किया गया था, क्योंकि उन कानूनों में अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जबकि यूपी गैंगस्टर एक्ट में ऐसा नहीं है।

अदालत ने कहा कि उसने यूपी गैंगस्टर एक्ट को “जन्म से ही दोषपूर्ण” पाया है, लेकिन इसका असर आईपीसी या अन्य आपराधिक कानूनों के तहत दर्ज मामलों पर नहीं पड़ेगा। उन मामलों की सुनवाई और कार्रवाई संबंधित कानूनों और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत जारी रहेगी।

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