सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। जिसमें पूर्वोत्तर भारत में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों को दी जाने वाली आयकर छूट में “क्रीमी लेयर” का सिद्धांत लागू करने की मांग की गई थी। यह देखते हुए कि यह मुद्दा विधायी क्षेत्र के अंतर्गत आता है और संसद द्वारा इसका सबसे अच्छा समाधान किया जा सकता है।
Law Beat के मुताबिक, सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि यह मामला कानून बनाने से जुड़ा है। इस फैसला करने का काम संसद का है। अदालत ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय को संबंधित संसदीय समिति के पास जाने की अनुमति दी। साथ ही, उन्हें याचिका की प्रतियां संबंधित पक्षों को देने की भी छूट प्रदान की गई।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस जनहित याचिका में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 11 तथा अनुसूची-III के क्रम संख्या 19 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। यह प्रावधान, 1961 के आयकर अधिनियम की धारा 10(26) को पुनः लागू करता है, जिसके तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों को आयकर में छूट दी जाती है।
मामले की पैरवी करते हुए अश्विनी उपाध्याय ने तर्क दिया कि जिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर यह कर छूट दी गई थी, वे पिछले कई दशकों में काफी बदल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि आज इस छूट का लाभ पाने वाले कई लोग अत्यधिक संपन्न हैं और उनके पास बड़े व्यावसायिक हित तथा बड़े कारोबार भी हैं।
अश्विनी उपाध्याय ने तर्क दिया, “ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासी, जो अब करोड़ों रुपये कमाते हैं, जिनके पास इतने सारे शिक्षण संस्थान हैं और जो प्रति वर्ष 200 करोड़ रुपये कमाते हैं, उन्हें अभी भी कर भुगतान से छूट कैसे मिल सकती है?” उन्होंने आगे कहा कि यह मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 27 की व्याख्या से संबंधित है।
याचिका में तर्क दिया गया कि अनुसूचित जनजातियों के धनी और आर्थिक रूप से वंचित सदस्यों को एक ही समान वर्ग मानकर व्यापक छूट मनमानी और अतिव्यापक हो गई है। इसमें आगे यह भी कहा गया कि आय सीमा, संपत्ति आधारित अपवर्जन, क्रीमी लेयर सिद्धांत या आवधिक समीक्षा तंत्र का अभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(जी), 21 और 27 का उल्लंघन करता है।
इस याचिका में लौकिक औचित्य के सिद्धांत का भी हवाला दिया गया, जिसमें यह तर्क दिया गया कि अधिनियमित होने के समय संवैधानिक रूप से वैध कानून असंवैधानिक हो सकता है, यदि वर्गीकरण को उचित ठहराने वाली तथ्यात्मक परिस्थितियां अब मौजूद नहीं हैं। हालांकि, पीठ इस बात से आश्वस्त नहीं दिखी कि न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “केवल इसलिए कि किसी ने किसी प्रावधान का दुरुपयोग किया है, इसका मतलब यह नहीं है कि सभी पर संदेह किया जाना चाहिए।” सीजेआई ने आगे टिप्पणी की कि निर्वाचित प्रतिनिधि और कानून निर्माता ऐसी चिंताओं से अवगत हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह एक विधायी मुद्दा है। संसद में एक समिति है जहां प्रत्येक नागरिक कानून बनाने या उसमें संशोधन करने के लिए संपर्क कर सकता है। मुझे यकीन है कि वे इस पर विचार करेंगे। कोर्ट ने इसके साथ ही याचिकाकर्ता को संसदीय समिति से संपर्क करने और विधायी चैनलों के माध्यम से अपनी शिकायतों को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता प्रदान की।
पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेजी बढ़ते विकास को आधार बनाकर इस याचिका में कहा गया था कि पिछले दो दशकों में वहां बुनियादी ढांचे, निवेश और आर्थिक विकास में काफी बढ़ोतरी हुई है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि बदली हुई परिस्थितियों के बावजूद अनुसूचित जनजातियों (ST) को बिना किसी सीमा के आयकर छूट जारी रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है और इससे एक वर्ग को स्थायी कर लाभ मिल रहा है।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस संवैधानिक चुनौती के गुण-दोष पर विचार करने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पूर्वोत्तर में अनुसूचित जनजातियों के लिए आयकर छूट को नियंत्रित करने वाले नीतिगत ढांचे पर पुनर्विचार करना मुख्य रूप से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
निसान कंपनी को ग्राहक को लौटाने होंगे 11 लाख रुपये, कंज्यूमर कोर्ट का फैसला
बिहार के पूर्वी चंपारण जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने निसान और उसके डीलरों को सेवा में लापरवाही का दोषी ठहराते हुए एक ग्राहक को 10.82 लाख रुपये ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है। ग्राहक ने वर्ष 2014 में 11 लाख रुपये से ज्यादा कीमत की निसान इवालिया कार खरीदी थी। कार का इंजन खराब होने के बाद उसे कंपनी की वर्कशॉप में खड़ा कर दिया गया, जहां वह लगभग आठ वर्षों तक पड़ी रही। जबकि कार विस्तारित वारंटी (एक्सटेंडेड वारंटी) के दायरे में थी। आयोग ने इसे कंपनी की गलती मानते हुए ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया। पढ़ें पूरी खबर।
