हिमाचल प्रदेश के एक उपभोक्ता आयोग ने डाबर इंडिया लिमिटेड को एक ‘श्रद्धालु हिंदू’ व्यक्ति को 70,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि सावन के पवित्र महीने में व्रत के दौरान उसने रियल फ्रूट पावर मौसंबी जूस का एक लीटर का पैक पिया जिसमें फफूंद (फंगस) पाई गई।
आयोग के अध्यक्ष हिमांशु मिश्रा तथा सदस्य आरती सूद और नारायण ठाकुर ने अपने आदेश में कहा कि फफूंद वाला जूस पीने के बाद यह अहसास होना कि उसका धार्मिक व्रत अशुद्ध पेय के कारण टूट गया। इसके अलावा, यह शिकायतकर्ता के लिए गहरे भावनात्मक, धार्मिक और मानसिक आघात का कारण बना। इसके अलावा, इससे उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ।
9 जुलाई को जारी आदेश में आयोग ने कहा, ”कंपनी को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए कि उसने एक खतरनाक और दूषित खाद्य उत्पाद बाजार में उपलब्ध कराया जिससे ना केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा पैदा हुआ बल्कि उपभोक्ता को गंभीर मानसिक पीड़ा भी हुई।”
आयोग ने डाबर इंडिया लिमिटेड को शिकायतकर्ता को 70000 रुपये का मुआवजा देने के साथ-साथ कांगड़ा जिला उपभोक्ता कल्याण कोष में 30000 रुपये जमा कराने का भी निर्देश दिया।
‘ब्लैक फंगस’ मिलने का दावा
शिकायतकर्ता ने बताया कि उसने 26 जुलाई 2024 को एक दुकान से ‘रियल फ्रूट पावर मौसंबी’ जूस का 1 लीटर का पैक खरीदा था। उसके अनुसार, यह प्रोडक्ट मई 2024 में डाबर इंडिया ने मैन्युफैक्चर किया था और इसकी एक्सपायरी डेट नवंबर 2024 थी।
शिकायतकर्ता का कहना है कि सावन के व्रत के दौरान शरीर में पानी की कमी ना हो, इसलिए उसने रियल जूस पिया था। इसी दौरान उसे जूस का स्वाद असामान्य लगा। जब उसने टेट्रा पैक को ध्यान से देखा तो उसमें बड़ी मात्रा में काला फफूंद (ब्लैक फंगस) दिखाई दिया।
उसने आरोप लगाया कि खराब जूस पीने से उसका धार्मिक व्रत टूट गया। इससे उसे गहरा मानसिक, भावनात्मक और धार्मिक आघात पहुंचा। शिकायतकर्ता के अनुसार, इस मामले में डाबर ने केवल जूस की नई बोतल देने की पेशकश की। इससे संतुष्ट न होकर उसने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
डाबर इंडिया ने अपने जवाब में किसी भी मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट से इनकार किया। कंपनी ने कहा कि उसी बैच के आंतरिक गुणवत्ता नियंत्रण (इंटरनल कंट्रोल) नमूने सभी क्वॉलिटी और सुरक्षा मानकों पर खरे उतरे थे। कंपनी के मुताबिक, उस बैच की 1.08 लाख से अधिक यूनिट बेची गईं और उनमें से किसी भी उपभोक्ता ने ऐसी कोई शिकायत नहीं की।
डाबर ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने कानून के अनुसार उत्पाद को लैब टेस्ट के लिए पेश नहीं किया जबकि ऐसे मामलों में यह जरूरी होता है।
ग्राहक को मिली राहत
उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता ने शिकायत दर्ज कराते समय जूस का मूल सीलबंद टेट्रा पैक आयोग के समक्ष पेश किया था। इसके बाद आयोग की निगरानी में उस नमूने को वैज्ञानिक जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया।
प्रयोगशाला की रिपोर्ट में जूस के अंदर फफूंद जैसी गंदगी के तैरते हुए गुच्छे (मोल्ड जैसी वृद्धि) पाए गए और निष्कर्ष निकाला गया कि यह पेय इंसानों के पीने के लिए सुरक्षित नहीं है।
आयोग ने डाबर के उस तर्क को भी खारिज कर दिया जिसमें कंपनी ने अपने इंटरनल क्वॉलिटी कंट्रोल के नमूनों का हवाला दिया था। आयोग ने कहा कि उपभोक्ता द्वारा खरीदे गए वास्तविक उत्पाद की लैब टेस्ट निर्माता की आंतरिक रिपोर्ट से ज्यादा विश्वसनीय और महत्वपूर्ण है।
आयोग ने अपने आदेश में कहा, ”जूस में फफूंद जैसी गंदगी का पाया जाना पैकेजिंग पर दिए गए ‘ग्रीन डॉट’ (शाकाहारी उत्पाद) के दावे का सीधे तौर पर खंडन करता है। यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(47) के तहत भ्रामक प्रस्तुतीकरण (Misleading Representation) और अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) है। इस तरह का उल्लंघन एक आस्थावान शाकाहारी परिवार को गहरी भावनात्मक, धार्मिक और सांस्कृतिक पीड़ा पहुंचाता है। इसके लिए यह साबित करना जरूरी नहीं कि उपभोक्ता शारीरिक रूप से बीमार पड़ा हो, तभी मुआवजा दिया जाए।”
आयोग ने यह भी माना कि रिटेलर ने उत्पाद को मूल सीलबंद टेट्रा पैक में ही बेचा था। चूंकि फफूंद हवा ना जाने वाले, फैक्ट्री में सीलबंद पैक के अंदर विकसित हुई थी, इसलिए यह स्पष्ट रूप से मैन्युफैक्चरिंग और पैकेजिंग में हुई खामी का मामला है।
शिकायत को स्वीकार करते हुए आयोग ने डाबर इंडिया लिमिटेड को शिकायतकर्ता को 60000 रुपये मुआवजे और 10000 रुपये मुकदमेबाजी खर्च के रूप में अदा करने का निर्देश दिया। साथ ही कंपनी को 45 दिनों के भीतर आदेश का पालन करने के लिए कहा गया।
