केरलम के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 10वें दिन भी सुनवाई हुई। कोर्ट ने वरिष्ठ इंदिरा जयसिंह की दलीलों के जवाब में कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। आस्था और विवेक के मामलों पर कोर्ट में बहस नहीं हो सकती। नौ जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि सुधार के बहाने धर्म के मूल स्वरूप को खत्म नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट आज 10वें दिन याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की दलील सुन रहा था, जिन्होंने अपनी दलील में यह भी उल्लेख किया कि शबरी एक महिला थीं जिन्होंने श्री राम को बेर खिलाए थे। जिन्होंने अपनी दलील में यह भी उल्लेख किया कि शबरी एक महिला थीं जिन्होंने श्री राम को बेर खिलाए थे। उन्होंने आज अपनी दलील का समापन करते हुए कहा, “मैं भी शबरी की तरह हूं, आप मुझे बाहर रख रहे हैं। बात यहीं खत्म होती है।”

इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि महिलाओं को रोकना अनुच्छेद 17 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को रोकना उनके जीवन के सबसे रचनात्मक समय को प्रतिबंधित करने जैसा है। उन्होंने तर्क दिया कि मंदिर में प्रवेश ‘श्रद्धा’ का विषय है और किसी भी रोक को ‘कानूनी चोट’ के आधार पर ही उचित ठहराया जा सकता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की दलीलों पर कहा कि हम भारत के सभ्यतागत और धार्मिक इतिहास की अनदेखी नहीं कर सकते। नागरत्ना ने कहा कि जीवंत संविधान अच्छी बात है, लेकिन हमें अतीत को नहीं भूलना चाहिए। इतिहास से ही वर्तमान बनता है, आप इसे पूरी तरह साफ कर नया इतिहास नहीं लिख सकते।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि अगर हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार किसी प्रथा को मानने या न मानने का अधिकार मांगेगा, तो धर्म का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। पीठ ने कहा कि धर्म के मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, अन्यथा यह ‘धर्म के विनाश’ जैसा होगा।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक बुनियादी सवाल उठाया कि अगर आप मंदिर के देवता में विश्वास रखते हैं, तो क्या आप उनसे जुड़ी परंपराओं को खारिज कर सकते हैं? उन्होंने कहा कि आस्था एक ‘पैकेज’ की तरह होती है। आप यह नहीं कह सकते कि आप मूर्ति को तो मानते हैं, लेकिन उसकी पूजा पद्धति या उससे जुड़ी वर्जनाओं को नहीं मानेंगे।

शीर्ष अदालत में यह सुनवाई 2018 के सबरीमाला फैसले से जुड़े संवैधानिक सवालों पर टिकी है। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस बात की जांच कर रही है कि क्या मंदिर में प्रवेश एक मौलिक अधिकार है या यह 1950 से पहले से चली आ रही एक परंपरा मात्र है।

‘1 मई को कोर्ट में पेश नहीं हुए तो कार्रवाई के लिए तैयार रहें’, कोर्ट ने पंजाब CM भगवंत मान को दी सख्त चेतावनी

पंजाब के मानसा की एक कोर्ट ने मंगलवार को मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ चल रहे मानहानि के मामले में बार-बार पेश न होने पर फटकार लगाई है। मानसा स्थित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) राजिंदर सिंह नागपाल ने बताया कि सीएम भगवंत मान अक्टूबर 2022 से अब तक एक बार भी अदालत में पेश नहीं हुए हैं, जिसके कारण मामले की आगे की कार्यवाही रुकी हुई है। उस समय उनकी पेशी के दौरान ही आवश्यक जमानत बांड जमा करने पर उन्हें जमानत दी गई थी। पढ़ें पूरी खबर।