सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संदीप मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को पत्र लिखकर राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसपी शर्मा के तत्काल तबादले की मांग की है। जस्टिस मेहता ने जस्टिस शर्मा पर शक्तियों के दुरुपयोग, रोस्टर में कथित हेरफेर और प्रशासनिक स्तर पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं।
इस मामले को न्यायपालिका के भीतर असाधारण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है। इस महीने की शुरुआत में लिखे गए तीन अलग-अलग पत्रों में जस्टिस मेहता ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के अन्य सदस्यों को भी अवगत कराया। उन्होंने कहा कि उन्हें जस्टिस शर्मा के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं, जो उनकी ‘ईमानदारी पर संदेह’ पैदा करती हैं।
‘तुरंत दूसरे हाईकोर्ट भेजा जाए’
जस्टिस मेहता ने अपने पत्र में मांग की कि जस्टिस एसपी शर्मा को उनके ‘अनुचित आचरण’ को देखते हुए तत्काल राजस्थान से बाहर किसी अन्य हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं करना संस्थान के हित के पूरी तरह खिलाफ होगा। द इंडियन एक्सप्रेस ने जब राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से इस संबंध में प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क किया, तो फोन कॉल का जवाब नहीं मिला।
2016 में राजस्थान हाईकोर्ट में हुआ था प्रमोशन
जस्टिस एसपी शर्मा को 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। वर्ष 2022 में उनका तबादला पटना हाईकोर्ट कर दिया गया। 2023 में उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए राजस्थान वापस भेजे जाने का अनुरोध किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की और उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट भेज दिया।
इस साल मई में कॉलेजियम ने राजस्थान वापस भेजे जाने के उनके अनुरोध को मंजूरी दी। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला।
रोस्टर में हेरफेर का आरोप
जस्टिस संदीप मेहता ने आरोप लगाया कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का पद संभालने के बाद जस्टिस शर्मा ने कई मौकों पर नेतृत्व क्षमता की कमी और संस्थान के प्रमुख के अनुरूप आचरण न करने का प्रदर्शन किया।
पत्र में दावा किया गया कि कई मामलों को, जो दूसरे रोस्टर में सूचीबद्ध थे, अचानक ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ की शक्तियों का इस्तेमाल करके वापस लिया गया और बिना किसी उचित कारण के जस्टिस शर्मा की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया। जस्टिस मेहता ने कहा कि इन मामलों में पारित आदेशों ने निर्णय लेने की प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
‘जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपमानित किया गया’
अपने एक पत्र में जस्टिस मेहता ने जयपुर में 31 जुलाई से 2 अगस्त तक आयोजित एक सम्मेलन का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उन्हें और सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य न्यायाधीश जस्टिस विजय बिश्नोई को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। दोनों ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले उद्घाटन सत्र में शामिल होने की सहमति दी थी।
हालांकि, जस्टिस मेहता के मुताबिक राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से जारी आमंत्रण कार्ड में दोनों सुप्रीम कोर्ट जजों के नाम का कोई उल्लेख नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि उद्घाटन सत्र में बोलने के लिए उनकी सहमति के बावजूद कार्यक्रम में उनका नाम शामिल नहीं किया गया। जब उन्होंने इस विसंगति की जानकारी अपने निजी सचिव के माध्यम से संबंधित अधिकारी को दी, तो कुछ मिनट बाद मंच पर संशोधित कार्यक्रम और औपचारिक माफी पेश की गई।
जस्टिस मेहता ने आरोप लगाया कि यह राजस्थान हाईकोर्ट से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीशों को ‘जानबूझकर अपमानित’ करने का प्रयास था।
गेस्ट हाउस कार्यक्रम में भी नाम नहीं होने का दावा
जस्टिस मेहता ने 1 अगस्त 2026 को जयपुर में हाईकोर्ट गेस्ट हाउस के शिलान्यास कार्यक्रम का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि शहर में मौजूद होने के बावजूद उन्हें और जस्टिस विजय बिश्नोई को कार्यक्रम की जानकारी नहीं दी गई।
उन्होंने पत्र में कहा कि कार्यक्रम अचानक आयोजित नहीं हुआ था। इसके लिए पहले से तैयारियां की गई थीं और निमंत्रण कार्ड भी छप चुके थे, लेकिन राजस्थान से जुड़े दोनों सुप्रीम कोर्ट जजों के नाम कथित तौर पर जानबूझकर आमंत्रण सूची से बाहर रखे गए। जस्टिस मेहता ने इसे ‘गंभीर और जानबूझकर किया गया अपमान’ बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।
भाई-भतीजावाद और पक्षपात के भी आरोप
एक अन्य पत्र में जस्टिस मेहता ने जस्टिस शर्मा पर ‘व्यापक भाई-भतीजावाद और पक्षपात’ में शामिल होने का आरोप लगाया। उन्होंने सवाल उठाया कि उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के पद पर 10 महीने से अधिक समय तक बने रहने की अनुमति क्यों दी गई।
पत्र में राजस्थान हाईकोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश के संदेशों का भी हवाला दिया गया, जिसमें जस्टिस शर्मा पर उनकी पत्नी के खिलाफ कथित ‘प्रतिशोधात्मक कार्रवाई’ करने का आरोप लगाया गया। उनकी पत्नी न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।
जोधपुर कोर्ट भवन के उद्घाटन को लेकर भी सवाल
जस्टिस मेहता ने जस्टिस शर्मा पर जोधपुर जिला न्यायालय (मेट्रो) की नवनिर्मित इमारत के उद्घाटन में लगभग एक साल तक कथित रूप से देरी करने का आरोप लगाया। उनके मुताबिक भवन पूरा होने के बावजूद उद्घाटन नहीं किया गया और इसके साथ ही अच्छी तरह तैयार बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर बदलाव के निर्देश दिए गए।
उन्होंने कहा कि यह फैसला ऐसे समय में लिया गया, जब जोधपुर मेट्रो न्यायिक क्षेत्र की कई अदालतें किराए के परिसरों में चल रही थीं। जस्टिस मेहता ने इस फैसले को संस्थान को हुआ ‘अक्षम्य नुकसान’ बताते हुए प्रशासनिक उदासीनता और अक्षमता पर सवाल उठाए।
CJI सूर्यकांत ने किया भवन का उद्घाटन
जस्टिस मेहता के अनुसार, उन्होंने और जस्टिस विजय बिश्नोई ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के सामने उठाया। इसके बाद सीजेआई ने जोधपुर जिला न्यायालय (मेट्रो) की इमारत का उद्घाटन किया।
इन आरोपों के सामने आने के बाद अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पर हैं। जस्टिस संदीप मेहता ने अपने पत्रों में जस्टिस एसपी शर्मा को राजस्थान से बाहर स्थानांतरित करने और किसी अन्य हाईकोर्ट से नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की मांग की है।
यह भी पढ़ें: 30 दिन की मिली पैरोल, 40 साल तक नहीं लौटा जेल! उम्रकैद का कैदी बना सरकारी टीचर, मिला ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड
तेलंगाना में एक उम्रकैद की सजा पाए कैदी का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1983 में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाला एक कैदी पैरोल पर जेल से बाहर आया और फिर वापस नहीं लौटा। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
