इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते बस्ती के एसपी डॉ. यशवीर सिंह को सुनवाई होने तक कोर्ट में मौजूद रहने का आदेश दिया। कारण यह था कि उन्होंने एक हत्या के मामले में अपने व्यक्तिगत हलफनामे में गलत तथ्य पेश किए थे। जिसको लेकर कोर्ट ने उन्हें भविष्य में सावधान रहने की चेतावनी भी दी।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने कहा कि उनके द्वारा दिया गया हलफनामा अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए था और जिम्मेदारी को बस्ती के संयुक्त निदेशक (अभियोजन) पर डालने की कोशिश की गई।

कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी करते हुए भी मामले में नरमी बरती, क्योंकि पुलिस प्रमुख ने माफी मांग ली थी। कोर्ट ने उन्हें चेतावनी दी कि भविष्य में हाई कोर्ट या किसी भी अदालत में हलफनामा दाखिल करते समय ज्यादा सावधानी बरतें। साथ ही, कोर्ट ने हत्या के आरोपी को जमानत भी दे दी।

संक्षेप में, आरोपी (मंजीत कुमार) ने जमानत के लिए आवेदन किया था, जिस पर कोर्ट ने निर्देश मांगे थे। लेकिन संयुक्त निदेशक (अभियोजन) द्वारा कई बार याद दिलाने के बावजूद राज्य की ओर से एजीए (सरकारी वकील) को जरूरी निर्देश उपलब्ध नहीं कराए गए।

इसलिए, न्यायालय ने पहले बस्ती के पुलिस अधीक्षक को अपनी ओर से हुई लापरवाही के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिए एक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। अपने हलफनामे (दिनांक 28 मार्च, 2026) में संबंधित एसपी ने देरी के लिए अभियोजन के संयुक्त निदेशक को दोषी ठहराया और दावा किया कि उन्हें 14 फरवरी को निर्देश तैयार करने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने उन्हें 17 मार्च तक विलंबित कर दिया।

एसपी के हलफनामे पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने संयुक्त अभियोजन निदेशक को तलब किया। उच्च न्यायालय के समक्ष पेश होकर उन्होंने अपना बचाव करते हुए कहा कि जांच अधिकारी का कर्तव्य है कि वह निर्देश तैयार करे और इस मामले में उन्हें जांच अधिकारी से टिप्पणियां 16 मार्च को ही प्राप्त हुईं और अगले दिन उनकी जांच करने के बाद उन्होंने उन्हें फाइल करने के लिए अग्रेषित कर दिया।

इसको ध्यान में रखते हुए पीठ ने पाया कि पुलिस जांच और एसपी का हलफनामा झूठा था और इसका उद्देश्य लापरवाह जांच अधिकारी को बचाना था। अतः, पीठ ने दोनों अधिकारियों (संयुक्त निदेशक अभियोजन और एसपी) को अगली तारीख को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया।

16 अप्रैल को जब इन तथ्यों से अवगत कराया गया, तो संबंधित एसपी ने अपनी गलती स्वीकार की और कहा कि उनका इरादा गलत तथ्य प्रस्तुत करने का नहीं था और परिओकर ने उन्हें गलत जानकारी दी थी। हालांकि, उन्होंने बिना शर्त माफी मांगी।

उनके रुख पर विचार करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि ” जिले का प्रभार दिए गए व्यक्ति को अपने अधीनस्थों, विशेष रूप से हेड कांस्टेबल या सब-इंस्पेक्टर द्वारा दी गई किसी भी जानकारी के प्रति सचेत रहना चाहिए, और उसे इस बात से अवगत होना चाहिए कि उच्च न्यायालय के समक्ष हलफनामे में कोई भी गलत तथ्य आपराधिक अवमानना ​​की कार्यवाही को आकर्षित कर सकता है “।

हालांकि, पीठ ने इस मामले में नरम रुख अपनाया और उनके खिलाफ आदेश पारित करने के बजाय कार्यवाही समाप्त होने तक अदालत में रहने का निर्देश दिया।

पीठ ने गौर किया कि मृतक को आवेदक के साथ अंतिम बार देखे जाने के अलावा घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और आवेदक ने यह स्वीकार किया था कि मृतक और आवेदक प्रेम संबंध में थे और दोनों ने जहर खा लिया था। इसके बाद, मृतक को आकस्मिक रूप से गिरने से चोटें आईं और आरोपी के पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ है। इस प्रकार पीठ ने आवेदक-आरोपी को जमानत दे दी।

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