बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के उस फैसले को सही ठहराया है जिसमें एक कर्मचारी को अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया गया था। यह कर्मचारी बिना इजाजत लगभग तीन साल तक ड्यूटी से गायब रहा था। कोर्ट ने कहा कि आरबीआई में एक जिम्मेदार पद से बिना इजाजत गायब रहना बिना किसी शक के जनहित के लिए नुकसानदायक है।
जस्टिस आर.आई. चागला और अद्वैत एम. सेठना, पूर्व सीनियर असिस्टेंट अनिमेष बाकुली की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। बाकुली ने 13 फरवरी 2023 के उस आदेश को रद्द करने की मांग की थी जिसके तहत उन्हें बिना इजाजत काम से गायब रहने के आधार पर अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया गया था। उन्होंने आरबीआई द्वारा रोकी गई सैलरी, भत्ते और अन्य लाभ भी जारी करने की मांग की थी।
बॉम्बे हाई कोर्ट के 10 जून के आदेश में कहा गया, “याचिकाकर्ता आरबीआई में सीनियर असिस्टेंट के पद पर था और उसने आरबीआई में पांच साल की सर्विस पूरी कर ली थी। वह निश्चित रूप से एक जिम्मेदार पद पर था और उतनी ही अवधि तक बिना इजाजत काम से गायब रहा। इसलिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, ऐसी बिना इजाजत अनुपस्थिति निश्चित रूप से जनहित के लिए नुकसानदायक होगी और इसे गंभीर कदाचार माना जाएगा, जिसके लिए नौकरी से बर्खास्तगी की जा सकती है।”
क्या है पूरा मामला?
अब पूरे मामले की बात करें तो रिकॉर्ड में यह बात सामने आई कि याचिकाकर्ता को आरबीआई ने 28 जनवरी, 2013 को अस्थायी रूप से असिस्टेंट (क्लास III) के पद पर नियुक्त किया था। छह महीने पूरे होने के बाद, याचिकाकर्ता को 1 अगस्त, 2013 को स्थायी कर्मचारी के तौर पर नियुक्त किया गया। इसके बाद, 31 जनवरी, 2018 को याचिकाकर्ता को सीनियर असिस्टेंट का पद दिया गया।
आरोप था कि याचिकाकर्ता ने 2017 और 2018 के बीच सेंट्रल बैंक से कई बार कोलकाता ट्रांसफर करने का अनुरोध किया था।
हालांकि, आरबीआई ने याचिकाकर्ता के ट्रांसफर के अनुरोध को ठुकरा दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता 19 मार्च, 2020 से अपनी ड्यूटी से गायब रहा और बिना इजाजत लगभग तीन साल तक काम से दूर रहा। उसने न तो अपने रिपोर्टिंग ऑफिसर से अनुमति ली और न ही आरबीआई को सूचित किया। आरबीआई ने याचिकाकर्ता को कई ईमेल भेजे, जिनमें उसे काम पर लौटने या मेडिकल सर्टिफिकेट के साथ छुट्टी की अर्जी देने के लिए कहा गया था।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने न तो उन संदेशों का कोई जवाब दिया और न ही अपनी गैर-मौजूदगी के बारे में कोई सफाई दी। आरबीआई का कहना था कि बार-बार मौका दिए जाने के बावजूद वह काम पर नहीं लौटा और असल में उसने अपना पद छोड़ दिया था। आखिरकार अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई। इसके चलते 31 जनवरी, 2023 को अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश जारी किया गया। यह आदेश याचिकाकर्ता को आरबीआई के पास मौजूद तीनों एड्रेस पर भेजा गया था।
यह भी दावा किया गया कि याचिकाकर्ता के माता-पिता ने 20 फरवरी, 2023 और 24 अप्रैल, 2023 को आरबीआई गवर्नर को पत्र लिखकर मामले में दखल देने की मांग की थी। हालांकि, याचिकाकर्ता का तर्क था कि अनुशासनात्मक कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए की गई थी। उसने दलील दी कि उसकी गैर-मौजूदगी की वजह कोविड-19 महामारी, माता-पिता की खराब सेहत और कोलकाता ट्रांसफर की उसकी अर्जियों का खारिज होना था।
याचिकाकर्ता ने रखा अपना पक्ष
खुद अपना पक्ष रखते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि इस आदेश के जरिये आरबीआई ने मनमाने फैसले से उसे नौकरी से निकाल दिया है, जो अनैतिक और असंवैधानिक है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि उस आदेश को रद्द किया जाना चाहिए और वह उन भुगतानों, भत्तों और अन्य सुविधाओं के हकदार हैं, जिन्हें आरबीआई ने बिना किसी सूचना के दिसंबर 2020 से गलत तरीके से रोक रखा था।
उन्होंने कहा कि 4 महीने बीतने के बाद भी आरबीआई ने उनकी अपील पर कोई कार्रवाई नहीं की, इसलिए उनके पास यह याचिका दायर करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। आरबीआई की ओर से पेश होते हुए सीनियर एडवोकेट एस. यू. कामदार ने तर्क दिया कि इतनी लंबी अवधि तक बिना इजाजत गैर-हाजिर रहने से जनहित को नुकसान पहुंचा है और इसलिए अनिवार्य रिटायरमेंट की सजा को कठोर या अनुचित नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने आगे कहा कि याचिकाकर्ता को सस्पेंड करने का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वह खुद ही ड्यूटी पर वापस नहीं लौटा था और बिना इजाजत के अनुपस्थित रहा था।
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