Rajasthan High Court Former Acting CJ: राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संदीप मेहता द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों पर पहली बार खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे पेशेवर ईर्ष्या और व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम बताया है।

सेवानिवृत्ति के ठीक बाद दिए गए इस इंटरव्यू ने देश की न्यायपालिका के गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि ऐसा कम ही देखने को मिलता है, जब कोई उच्च पद से सेवानिवृत्त जज इस तरह खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दे।

‘हाईकोर्ट के मामलों में दखल का हक नहीं’

न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा ने स्पष्ट रूप से कहा, “सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संदीप मेहता को राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासनिक या आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं था।” उनके अनुसार यदि कोई शिकायत या मतभेद था भी, तो उसके लिए एक स्थापित संस्थागत प्रक्रिया होती है जिसके तहत मामले को सबसे पहले देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के संज्ञान में लाया जाना चाहिए था।

इस तरह खुले तौर पर या पत्रों के माध्यम से हाईकोर्ट के कामकाज पर सवाल उठाना न्यायिक गरिमा और अनुशासन के अनुकूल नहीं है। पेशेवर ईर्ष्या और पारिवारिक पृष्ठभूमि का लगाया आरोप यह पूछे जाने पर कि न्यायमूर्ति मेहता ने उन पर ऐसे आरोप क्यों लगाए, पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने इसे पेशेवर ईर्ष्या करार दिया।

खुद के दम पर मुकाम हासिल करने की कही बात

उन्होंने याद दिलाया कि साल 2011 में जब दोनों को एक साथ सीनियर एडवोकेट बनाया गया था, तब से लेकर अब तक के सफर में कार्यशैली और पारिवारिक पृष्ठभूमि का असर फैसलों और विचारों पर देखा जा सकता है। न्यायमूर्ति शर्मा ने खुद को एक फर्स्ट-जेनेरेशन लॉयर (पहला वकील) बताया, जिन्होंने बिना किसी पारिवारिक न्यायिक पृष्ठभूमि के अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है।

वकीलों को भड़काने का गंभीर दावा

इंटरव्यू के दौरान न्यायमूर्ति शर्मा ने यह भी आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के जज के पत्रों और बयानों के कारण ही राजस्थान के वकीलों को विरोध प्रदर्शन के लिए बढ़ावा मिला।

उन्होंने बताया कि उनके लगभग साढ़े ग्यारह महीने के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल के दौरान राज्य में एक भी दिन वकीलों की हड़ताल नहीं हुई थी। लेकिन इस विवाद के तूल पकड़ने और बयानों के सार्वजनिक होने के बाद माहौल खराब हुआ, जिससे आम जनता का न्यायपालिका के प्रति विश्वास प्रभावित होता है।

फैसलों में पक्षपात के आरोपों का खंडन

पूर्व न्यायमूर्ति शर्मा ने अपने ऊपर लगे उन तमाम आरोपों का कड़ाई से खंडन किया जिनमें रोस्टर में हेरफेर करने, खास मुकदमों को अपनी बेंच में शिफ्ट करने और प्रभावशाली मुक़दमेबाजों को अनुचित लाभ पहुंचाने की बात कही गई थी।

उन्होंने सफाई दी कि मुकदमों का आवंटन और रोस्टर बदलना चीफ जस्टिस के अधिकार क्षेत्र का हिस्सा होता है, जो वकीलों की समस्याओं, मुकदमों की पेंडेंसी और सरकारी इनपुट के आधार पर प्रशासनिक हित में लिया जाता है। पूर्व कार्यवाहक चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि उनके अपने परिवार के सदस्यों के मामले लंबे समय से लंबित हैं, जिसका उन्होंने कभी अपने पद का लाभ उठाकर फायदा नहीं उठाया।

ऐतिहासिक फैसलों का किया बचाव

अपने छोटे लेकिन प्रभावशाली कार्यकाल का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि उन्होंने अपने नौ साल से अधिक के जज के करियर में 88,000 से अधिक मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया है। उनके कई महत्वपूर्ण फैसलों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सही ठहराया गया है। दिल के तीन बड़े दौरों (हार्ट अटैक) और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौतियों के बावजूद उन्होंने प्रतिदिन 18 घंटे काम करके राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासनिक सुधारों, बुनियादी ढांचे और वित्तीय अनुदानों को बढ़ाने का काम किया।

न्यायपालिका की आंतरिक मर्यादा और भविष्य की दिशाइस पूरे विवाद के अंत में न्यायमूर्ति शर्मा ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि जजों के बीच के आंतरिक वैचारिक मतभेद इस तरह सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर नहीं आने चाहिए।

उन्होंने 1997 के ‘प्रकाश चंद बनाम राजस्थान राज्य’ मामले के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि हम सब स्थापित दिशानिर्देशों से बंधे हुए हैं। इस हाई-प्रोफाइल मामले ने एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालतों और हाईकोर्ट के बीच प्रशासनिक नियंत्रण, अधिकार क्षेत्र और जजों की जवाबदेही जैसे गंभीर कानूनी सवालों को फिर से देश के सामने ला खड़ा किया है।

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