Rajasthan High Court: क्या कोई भी पत्नी अपन पति की सैलरी के बारे में आरटीआई के तहत जानकारी हासिल कर सकती है? इसी सवाल के साथ एक महिला ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसको लेकर कोर्ट ने महिला की मांग को खारिज कर दिया और कहा कि सैलरी व्यक्तिगत जानकारी के दायरे में आती है। इसीलिए यह जानकारी नहीं हासिल की जा सकती है।

राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस कुलदीप माथुर की बेंच ने 3 फरवरी को पारित एक आदेश में कहा कि किसी तीसरे पक्ष से संबंधित जानकारी प्रदान करने से इनकार करने में राज्य की कार्रवाई में कोई अवैधता या खामी नहीं है। याचिकाकर्ता महिला ने जनवरी से मार्च 2024 की अवधि के लिए अपने पति को भुगतान किए गए वेतन की डिटेल्स मांगी थी। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि यह व्यक्तिगत प्रकृति की थी और किसी तीसरे पक्ष से संबंधित थी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून का रखा गया ध्यान

गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयुक्त और अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून का ध्यान रखा। इसमें यह माना गया है कि किसी संगठन में किसी कर्मचारी या अधिकारी के प्रदर्शन से संबंधित जानकारी मुख्य रूप से कर्मचारी और नियोक्ता के बीच का मामला है, जो सेवा नियमों द्वारा शासित होता है, और “व्यक्तिगत जानकारी” के दायरे में आता है। किसी सर्वोपरि जनहित के अभाव में ऐसी जानकारी का खुलासा किसी भी सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से संबंधित नहीं है। इसीलिए हाई कोर्ट ने याचिका को कोई तवज्जो नहीं दी।

इस मामले में याचिकाकर्ता ने क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त से एक उप-क्षेत्रीय कार्यालय में प्रवर्तन अधिकारी के तौर पर काम करने वाले व्यक्ति के बारे में जानकारी के लिए आवेदन किया था। मांगी गई जानकारी अधिकारी की नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानांतरण आदेशों, अनुशासनात्मक कार्यवाही, ज्ञापनों और कारण बताओ नोटिसों की प्रतियों के साथ-साथ चल और अचल संपत्तियों, निवेशों, प्राप्त उपहारों और आयकर रिटर्न के विवरण से संबंधित थी।

मांग को क्यों किया गया अस्वीकार

इस मांग को अस्वीकार कर दिया गया था, और केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने इस अस्वीकृति को बरकरार रखा। सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि किसी संगठन में किसी कर्मचारी/अधिकारी का प्रदर्शन मुख्य रूप से कर्मचारी और नियोक्ता के बीच का मामला है और सामान्यतः ऐसे पहलुओं को सेवा नियमों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जो “व्यक्तिगत जानकारी” अभिव्यक्ति के अंतर्गत आते हैं।

इसमें यह भी कहा गया है कि इस तरह की जानकारी का खुलासा किसी भी सार्वजनिक गतिविधि या सार्वजनिक हित से संबंधित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जानकारी का खुलासा उस व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन होगा। इस फैसले में तर्क दिया गया है कि यदि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय प्राधिकरण के राज्य लोक सूचना अधिकारी संतुष्ट हैं कि व्यापक जनहित में जानकारी का खुलासा करना उचित है, तो उचित आदेश पारित किए जा सकते हैं, लेकिन याचिकाकर्ता उन विवरणों को अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकता है।

किसी व्यक्ति द्वारा अपने आयकर रिटर्न में दी गई जानकारी को “व्यक्तिगत जानकारी” माना जाता है और इसे सार्वजनिक करने से छूट दी जाती है, जब तक कि इसमें व्यापक जनहित शामिल न हो। शीर्ष न्यायालय ने माना कि ऐसी जानकारी का खुलासा आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जे) के तहत व्यक्ति की निजता पर अनुचित आक्रमण का कारण बनेगा। सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में कहा गया है कि ऐसी कोई भी जानकारी प्रदान करने की बाध्यता नहीं होगी जो व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित हो, जिसका खुलासा किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से संबंधित न हो, या जिससे व्यक्ति की निजता पर अनुचित आक्रमण हो।

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

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