पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महिला की याचिका खारिज कर दी। महिला ने मांग की थी कि जिस व्यक्ति पर उसने शादी का झूठा वादा करके बलात्कार करने का आरोप लगाया है, उसके माता-पिता और दादी पर भी मुकदमा चलाया जाए। महिला का कहना था कि उस व्यक्ति के परिवार वालों ने भी उसे शादी का भरोसा दिया था, इसलिए वे भी इस झूठे वादे में शामिल हैं।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति शालिनी सिंह नागपाल ने कहा कि एफआईआर और महिला के बयान में परिवार के सदस्यों का नाम आने से अपने-आप उनके खिलाफ मामला नहीं बन जाता। यौन संबंध केवल महिला और उस व्यक्ति के बीच हुए थे। इसलिए माता-पिता और दादी द्वारा शादी का आश्वासन देना, आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) या किसी अन्य अपराध के तहत उन्हें आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पुलिस ने जांच के बाद केवल उस पुरुष के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। इसके बाद महिला ने निचली अदालत में बीएनएसएस की धारा 358 के तहत आवेदन देकर उसके परिवार वालों को भी तलब करने की मांग की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने साफ कहा कि कानून के हिसाब से परिवार के सदस्यों पर मुकदमा चलाने का कोई ठोस आधार नहीं है, इसलिए महिला की याचिका खारिज कर दी गई।
निचली अदालत ने 22 जनवरी को महिला की याचिका पहले ही खारिज कर दी थी। इसके बाद महिला ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने कहा कि किसी मामले में अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने की शक्ति बहुत खास और असाधारण होती है। इस शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर और केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जहां इसके लिए ठोस परिस्थितियां हों।
कोर्ट ने साफ कहा कि केवल इस आधार पर कि अदालत को लगता है कि कोई और भी दोषी हो सकता है, किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता। अदालत के सामने मजबूत और ठोस सबूत होने चाहिए। बिना पुख्ता सबूत के, लापरवाही या मनमाने ढंग से किसी को तलब नहीं किया जा सकता।
अदालत ने माना कि निचली अदालत के जज ने महिला का आवेदन सही तरीके से खारिज किया था, क्योंकि उस व्यक्ति के माता-पिता और दादी के खिलाफ अतिरिक्त आरोपी बनाने के लिए प्रथम दृष्टया (शुरुआती तौर पर) कोई मामला नहीं बनता था।
इसलिए उच्च न्यायालय ने कहा कि जिस आदेश को चुनौती दी गई है, वह पूरी तरह तार्किक और कानूनी है। उसमें दखल देने की कोई जरूरत नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने महिला की पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर दी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिविल जज के खिलाफ कार्रवाई का दिया आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद की एक सिविल अदालत के जज के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। यह मामला एक संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जिसमें निचली अदालत ने एक किरायेदार को उस संपत्ति पर कब्जा और मालिकाना हक दे दिया था। पूरी खबर पढ़ें।
