Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर किसी कैदी की हिरासत में अप्राकृतिक तरीके से मौत होती है, तो उसके लिए पूरी तरह से राज्य सरकार जिम्मेदार होगी, भले ही वह मृत्यु आत्महत्या ही क्यों न हो।

हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और मानवीय गरिमा का अधिकार एक आंतरिक और सर्वव्यापी अधिकार है। जो राज्य द्वारा अवैध रूप से गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्ति तक भी विस्तारित है।

जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने 20 फरवरी को प्रेमा देवी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। प्रेमा देवी ने पीलीभीत जिला जेल में अपने नाबालिग बेटे की मौत के लिए मुआवजे की मांग की थी।

अदालत ने प्रतिवादियों- राज्य सरकार और अन्य अधिकारियों को तीन सप्ताह के भीतर कानूनी वारिसों को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से मुआवजे के निर्धारण के लिए दिशानिर्देश तैयार करने को भी कहा। इसमें कहा गया है कि सरकार को हिरासत में हुई मौतों के मामलों में मुआवजे के निर्धारण के लिए प्रासंगिक और तर्कसंगत मापदंड अपनाने चाहिए, जो मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत आयु, आय और आश्रितों पर आधारित गुणक पद्धति के समान हों।

फैसले के अनुसार, याचिकाकर्ता के बेटे, जो पॉक्सो मामले में विचाराधीन था। उसने 20 फरवरी, 2024 को आत्महत्या कर ली। उसका शव जेल के शौचालय के वेंटिलेटर से लटका हुआ मिला।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने पहले तीन लाख रुपये के मुआवजे की सिफारिश की थी। मुआवजा न मिलने पर याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि मृतक को अवैध पैसों की मांग को लेकर पुलिसकर्मियों द्वारा प्रताड़ित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः उसकी मृत्यु हो गई। हालांकि, सरकारी वकील ने तर्क दिया कि यह आत्महत्या का मामला था और रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे अधिकारियों की लापरवाही, दुर्व्यवहार या संलिप्तता का संकेत मिले।

राज्य ने आगे बताया कि औपचारिकताओं के पूरा होने और आवश्यक बजटीय आवंटन प्राप्त होने के बाद स्वीकृत मुआवजा जारी कर दिया जाएगा। अदालत ने कहा कि हिरासत में होने वाली मौतें न्याय व्यवस्था के भीतर मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक हैं। अदालत ने यह भी कहा कि गैरकानूनी हिरासत या हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजे के प्रावधान का कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान न होना ‘अत्यंत आश्चर्यजनक’ है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस को लगाई फटकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एफआईआर में हिंदी फिल्म के डायलॉग के लिए पुलिस को फटकार लगाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने आपराधिक मामलों में दर्ज एफआईआर में पुलिस द्वारा बार-बार एक ही पैटर्न का इस्तेमाल करने पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने एफआईआर को बेतुका और जमीनी हकीकत से मेल न खाने वाला बताया। यह भी पढ़ें।