इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी वयस्क व्यक्ति द्वारा अपने साथी का चुनाव या फिर दो वयस्कों बीच सहमति से विवाह की पुलिस जांच न केवल आपराधिक कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि उनकी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन भी है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने कहा कि पुलिस को इस तरह के विवाहों की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है और उसे अपराधों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 27 जुलाई को कहा, “पुलिस को इस मामले में दखलंदाजी देने का कोई अधिकार नहीं है। हमने पुलिस को बार-बार याद दिलाया है कि विवाहों की जांच करना उनका काम नहीं है। उन्हें अपराधों की जांच करनी चाहिए। यह कोई ऐसा अपराध नहीं है, जिसमें किसी जांच की आवश्यकता हो।”
अदालत ने यह टिप्पणी 28 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ 26 वर्षीय महिला का अपहरण करके उससे जबरन शादी कराने के आरोप में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIE) को रद्द करते हुए की।
महिला के पिता की शिकायत पर अप्रैल में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 87 (किसी महिला को जबरन शादी कराने के लिए उसका अपहरण करना) के तहत मामला दर्ज किया गया था। बाद में हिंदू दंपति ने अदालत का रुख करते हुए कहा कि उन्होंने इस साल फरवरी में शादी की थी, लेकिन महिला के परिवार वाले इसके खिलाफ थे। आरोप है कि उन्होंने महिला की पिटाई की और उसे तथा उसके पति को जान से मारने की धमकी दी।
29 अप्रैल को अदालत ने एफआईआर की जांच पर रोक लगा दी और पुलिस को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत स्थिति रिपोर्ट की जांच करने के बाद न्यायालय ने 27 जुलाई (सोमवार) को अपना अंतिम आदेश पारित किया। न्यायालय ने कहा कि जांच करने योग्य कोई मामला नहीं है और पुलिस इस मामले में अपना समय पूरी तरह से बर्बाद कर रही है।
प्रलोभन या बहकावे का कोई पहलू नहीं- इलाहाबाद हाई कोर्ट
पीठ ने आगे कहा कि दो वयस्क व्यक्तियों ने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार आपस में विवाह किया है और दोनों ही सुशिक्षित और योग्य व्यक्ति हैं। दोनों की आयु और शिक्षा को देखते हुए इस मामले में प्रलोभन या बहकावे का कोई पहलू नहीं है। पहले याचिकाकर्ता की आयु 27 या 28 साल है।
अदालत ने कहा कि वह भदोही के पुलिस अधीक्षक द्वारा मामले में जांच पूरी किए जाने के रुख से पूरी तरह से निराश है। पीठ ने टिप्पणी की कि पुलिस को इस मामले को खत्म कर देना चाहिए। जिसका प्रमुख आधार महिला का हाई कोर्ट के समक्ष दिया गया बयान। जिससे विवाह के लिए उसकी सहमति का संकेत मिलता है।
कोर्ट ने आगे कहा कि पुलिस अधीक्षक द्वारा पीड़िता का बयान धारा 180 बीएनएसएस के तहत जांच अधिकारी के समक्ष और धारा 183 बीएनएसएस के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराने पर जोर देना लगभग अवज्ञापूर्ण है। अदालत ने आगे कहा कि पुलिस द्वारा पक्षों के बयान दर्ज करके जांच जारी रखने की इच्छा जताने से ऐसा प्रतीत होता है कि वह वास्तव में महिला के परिवार का पक्ष ले रही है। अदालत ने पुलिस को याद दिलाया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने की स्वतंत्रता भी शामिल है।
पीठ ने आगे कहा कि एक वयस्क महिला द्वारा अपने जीवनसाथी के स्वतंत्र चुनाव और देश के दो वयस्क नागरिकों के बीच विवाह की इस जांच को जारी रखना न केवल आपराधिक कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत उनकी मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंघन भी है।
तथ्यों पर विचार करते हुए, न्यायालय ने एफआईआर रद्द कर दी और भदोही के पुलिस अधीक्षक और जिला भदोही के सुरियावां पुलिस स्टेशन के थाना अधिकारी पर 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया। न्यायालय ने महिला के पिता को भी उसे 5000 रुपये देने का आदेश दिया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 28 जुलाई को मुंबई पुलिस द्वारा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ जारी निष्कासन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को न गिराए जाने के पक्ष में राय व्यक्त करना राष्ट्र-विरोधी नहीं माना जा सकता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या याचिकाकर्ताओं को उनके धर्म के कारण निशाना बनाया जा रहा है। पढ़ें पूरी खबर।
