प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है। जन सुराज ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों से पहले मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए राज्य कल्याण योजना के दुरुपयोग को चुनौती दी है। किशोर की पार्टी ने 2025 के चुनावों में 243 विधानसभा सीटों में से 242 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट हासिल करने में असफल रही।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जन सुराज ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई चुनौती का मुख्य मुद्दा नीतीश के नेतृत्व वाली बिहार सरकार द्वारा चुनाव से ठीक पहले शुरू की गई मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना है। इस योजना के तहत, राज्य सरकार ने प्रत्येक परिवार की एक महिला को स्वरोजगार शुरू करने में सहायता के लिए सीधे 10,000 रुपये ट्रांसफर करने का निर्णय लिया था। साथ ही मूल्यांकन के बाद 2 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता देने का भी वादा किया था।
याचिका में कहा गया है कि इस योजना का लाभ वही महिलाएं ले सकती थीं, जो महिला स्वयं सहायता समूहों के नेटवर्क ‘जीविका’ की सदस्य हों। बाद में राज्य सरकार ने यह घोषणा की कि जो महिलाएं पहले से जीविका की सदस्य नहीं हैं, वे भी पंजीकरण कराकर योजना का लाभ ले सकती हैं।
जन सुराज पार्टी का आरोप है कि आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले करीब 1 करोड़ महिलाएं ही जीविका से जुड़ी थीं। लेकिन अखबारों की खबरों के अनुसार, अंत में 1.56 करोड़ महिलाओं को इस योजना के तहत पैसा मिला। पार्टी का कहना है कि इससे साफ संकेत मिलता है कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद और आदर्श आचार संहिता लागू रहने के दौरान नई महिलाओं को योजना में जोड़ा गया और उन्हें भुगतान भी किया गया।
याचिका में तर्क दिया गया है कि इस अवधि के दौरान नकद लाभ जारी करना “भ्रष्ट आचरण” के बराबर था, जिसका उद्देश्य सत्तारूढ़ सरकार के पक्ष में मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करना था। याचिका में दावा किया गया है कि इससे अन्य राजनीतिक दलों को समान अवसर से वंचित किया गया और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की मूल आवश्यकता का उल्लंघन हुआ।
याचिका में भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि योजना की लाभार्थी महिलाओं को मतदान के दोनों चरणों में मतदान केंद्रों पर तैनात किया गया था, जबकि उनमें से कई को पहले ही नकद लाभ मिल चुका था।
जन सुराज के अनुसार, इस तैनाती का कोई तर्कसंगत आधार नहीं था और इससे चुनावों के दौरान अपेक्षित निष्पक्षता और भी खतरे में पड़ गई। याचिका में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा योजना के वित्तपोषण से संबंधित है। पार्टी का दावा है कि कार्यक्रम को विधायी स्वीकृति के बिना मंत्रिमंडल के निर्णय द्वारा अनुमोदित किया गया था और संविधान के अनुच्छेद 267 का कथित उल्लंघन करते हुए राज्य के आकस्मिक निधि से धन निकाला गया था। यह भी आरोप लगाया गया है कि योजना नियमित बजटीय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थी।
याचिका में कहा गया है कि उसका पक्ष मजबूत करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग के पहले से जारी आदर्श आचार संहिता से जुड़े निर्देशों का सहारा लिया गया है। इन निर्देशों के अनुसार, चुनाव की घोषणा के बाद सरकारें ऐसी कोई नई कल्याणकारी योजना शुरू नहीं कर सकतीं, न ही किसी योजना का विस्तार कर सकती हैं, न ही नए फंड जारी कर सकती हैं, अगर उससे मतदाताओं पर असर पड़ता हो।
याचिका में यह तर्क दिया गया है कि कि इन साफ-साफ निर्देशों के बावजूद बिहार सरकार ने चुनाव के दौरान नकद राशि का भुगतान जारी रखा, और चुनाव आयोग इस पर समय रहते और प्रभावी तरीके से रोक लगाने में असफल रहा।
याचिका में यह भी कहा गया है कि चुनाव से ठीक पहले शुरू की गई और एमसीसी लागू रहने के दौरान जारी रही इस तरह की सीधी नकद सहायता योजना का चुनाव पर असर पड़ना स्वाभाविक था, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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इस प्रकार, चुनाव प्रक्रिया दूषित हो गई। इससे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और अनुच्छेद 14, 21 और 324 के तहत संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन हुआ, ऐसा तर्क दिया गया है। पार्टी ने अदालत को बताया है कि वह समाचार पत्रों की रिपोर्टों पर भरोसा कर रही है क्योंकि सरकारी वेबसाइटों पर आधिकारिक दस्तावेज और आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
याचिका में यह भी याद दिलाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल भावना है। साथ ही यह तर्क दिया गया है कि कल्याणकारी योजनाओं का इस्तेमाल चुनाव में फायदा उठाने के लिए नहीं किया जा सकता। इस याचिका पर शुक्रवार, 6 फरवरी को सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में सुनवाई होने की संभावना है।
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