सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों और प्रशिक्षकों के साथ अनुचित व्यवहार किया है। कोर्ट ने पाया कि इन शिक्षकों से 10 साल से ज्यादा समय तक सिर्फ 7,000 रुपये महीना देकर काम कराया गया, जो लगभग बेगार के समान है।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि लंबे समय से वेतन न बढ़ाना और कम पैसा देना गलत है। इसे देखते हुए कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह वित्त वर्ष 2017-18 से सभी शिक्षकों को 17,000 रुपये प्रति माह मानदेय दे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बकाया राशि छह महीने के भीतर सभी शिक्षकों को दी जाए।
शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि उत्तर प्रदेश के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में काम कर रहे अंशकालिक संविदा प्रशिक्षक और शिक्षक अपने 7,000 रुपये मासिक मानदेय में संशोधन के हकदार हैं। यह मानदेय साल 2013 में सिर्फ 11 महीने के अनुबंध के लिए तय किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि मानदेय में हर साल नहीं तो समय-समय पर बदलाव होना चाहिए, और यह फैसला पीएबी (परियोजना अनुमोदन बोर्ड) ले सकता है। चूंकि पीएबी ने वर्ष 2017-18 के लिए मानदेय 17,000 रुपये प्रति माह तय किया था, इसलिए इस योजना के तहत नियुक्त सभी प्रशिक्षक और शिक्षक 2017-18 से लेकर अगले संशोधन तक 17,000 रुपये प्रति माह पाने के हकदार हैं।
यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार के 2013 के एक सरकारी आदेश से जुड़ा है। इस आदेश के तहत सर्व शिक्षा अभियान में शारीरिक शिक्षा, कला और कार्य शिक्षा के प्रशिक्षकों को 11 महीने के अनुबंध पर रखा गया। उन्हें हर महीने 7,000 रुपये का तय मानदेय दिया जाता था, जिसे हर साल बढ़ाया या नवीनीकृत किया जा सकता था। बाद में मानदेय बढ़ाने की सिफारिशें हुईं और मंजूरी भी मिली। 2017-18 में परियोजना अनुमोदन बोर्ड (पीएबी) ने 17,000 रुपये प्रति माह देने की स्वीकृति दी थी। इसके बावजूद शिक्षकों को बढ़ा हुआ वेतन नहीं मिला। इसके उलट, 2019-20 से उनका मानदेय फिर से घटाकर 7,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया। इसी वजह से यह विवाद खड़ा हुआ।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि केंद्र सरकार ने योजना के तहत अपनी पूरी धनराशि नहीं दी। सरकार ने बताया कि समग्र शिक्षा योजना में खर्च 60:40 के अनुपात में बंटता है, जिसमें 60% केंद्र और 40% राज्य देता है। राज्य का कहना था कि जब केंद्र अपना 60% हिस्सा नहीं देता, तो राज्य से पूरी रकम देने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
लेकिन न्यायालय ने इस दलील को साफ-साफ खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि योजना का पैसा कैसे बंटेगा, यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के नियमों के खिलाफ नहीं हो सकता। केंद्र और राज्य के बीच पैसों की व्यवस्था उनका आपसी प्रशासनिक मामला है, और इसका असर शिक्षकों के अधिकारों या बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार पर नहीं पड़ना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों को मानदेय देने की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। बाद में राज्य सरकार चाहे तो “पहले भुगतान, बाद में वसूली” के सिद्धांत के तहत केंद्र सरकार से उसका हिस्सा वसूल कर सकती है।
अदालत ने कहा कि प्रावधान को पढ़ने से साफ है कि राज्य सरकार को सिर्फ केंद्र से मिलने वाले पैसे पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे अपने अन्य संसाधनों को भी ध्यान में रखकर कानून को लागू करने के लिए धन की व्यवस्था करनी होगी। इसलिए, प्रशिक्षकों और शिक्षकों को मानदेय देना राज्य सरकार की अहम जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो जाती कि केंद्र सरकार ने अपना हिस्सा नहीं दिया।
शीर्ष अदालत ने साफ किया कि अगर केंद्र सरकार पैसा देने में देर या कमी करती है, तो राज्य सरकार पहले शिक्षकों को भुगतान करेगी और बाद में केंद्र सरकार से उसका हिस्सा वसूल करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन किसी भी हालत में शिक्षकों को मानदेय देने से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी को अदालत ने “पहले भुगतान, बाद में वसूली” का सिद्धांत बताया।
कोर्ट के निष्कर्ष इस प्रकार हैं-
अंशकालिक या संविदा पर रखे गए प्रशिक्षक/शिक्षक 11 महीने की अवधि पूरी होने या अनुबंध बढ़ने के बाद भी केवल संविदा कर्मचारी नहीं माने जा सकते। उनका काम अस्थायी नहीं रह जाता।
ये प्रशिक्षक वास्तव में अंशकालिक नहीं थे, क्योंकि उन्हें खाली समय में कहीं और नौकरी या काम करने की अनुमति नहीं थी।
जो प्रशिक्षक/शिक्षक 10 साल से अधिक समय तक लगातार काम कर रहे हैं, उन्हें स्थायी पदों पर काम करने वाला माना जाएगा। इतने लंबे समय तक काम होने से पद अपने आप स्थायी माने जाते हैं।
इस योजना के तहत बजट, वित्त और मानदेय तय करने का पूरा अधिकार केवल पीएबी (PAB) के पास है। इस मामले में किसी अन्य अधिकारी या संस्था का अधिकार नहीं है।
जब पीएबी ने 44 प्रशिक्षकों/शिक्षकों के लिए 17,000 रुपये प्रति माह मानदेय मंजूर कर दिया है, तो कोई भी विभाग या सरकार इसके खिलाफ फैसला नहीं ले सकती।
प्रशिक्षकों/शिक्षकों को मानदेय देने की जिम्मेदारी पहले राज्य सरकार की है। बाद में राज्य सरकार “भुगतान और वसूली” के सिद्धांत के तहत केंद्र सरकार से उसका हिस्सा वसूल सकती है।
प्रशिक्षकों/शिक्षकों का मानदेय लंबे समय तक एक जैसा नहीं रखा जा सकता। इसे कम से कम हर तीन साल में पीएबी या संबंधित प्राधिकरण द्वारा संशोधित किया जाना चाहिए।
यह भी पढ़ें- ‘मैं बंधुआ मजदूर, पार्टी नहीं न्याय के लिए खड़ी हुई’, SIR सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में बोलीं सीएम ममता
2013-14 में तय किए गए 7,000 रुपये प्रति माह जैसे कम और निश्चित मानदेय पर काम कराना जबरन मेहनत (बेगार) के बराबर है और यह संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।
जब पीएबी ने 2017-18 से 17,000 रुपये प्रति माह मानदेय तय कर दिया है, तो राज्य या केंद्र सरकार द्वारा 7,000, 8,470 या 9,800 रुपये प्रति माह देना गलत और अनुचित है।
यह भी पढ़ें- 10 साल में निचली अदालत ने 1300 लोगों को दी फांसी की सजा, हाईकोर्ट ने महज 70 ही रखे बरकरार
