पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी गांव से मात्र डेढ़ किलोमीटर दूर स्कूल का निर्माण बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू और न्यायमूर्ति हरीश कुमार की खंडपीठ ने 17 अप्रैल को यह आदेश पारित किया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित स्कूल को ‘शिक्षा के अधिकार’ के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

याचिकाकर्ता ने हसनपुरा गांव के बच्चों के हितों का हवाला देते हुए मांग की थी कि पड़ोसी गांव में प्रस्तावित प्राथमिक विद्यालय भवन के निर्माण पर रोक लगाई जाए। साथ ही, जनहित याचिका में यह आग्रह किया गया कि स्कूल का निर्माण हसनपुरा गांव में ही, सरकारी मिडिल स्कूल के पास उपलब्ध सरकारी जमीन पर किया जाए। याचिका में यह तर्क दिया गया था कि दूसरे गांव में स्कूल बनने से बच्चों को असुविधा होगी।

पटना हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना, स्थान चयन और बुनियादी ढांचे का विकास पूरी तरह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासनिक अधिकारी किसी जिले की शैक्षणिक जरूरतों का बेहतर आकलन करने में सक्षम होते हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी एक सरकारी जमीन को दूसरे के ऊपर चुनना एक “प्रशासनिक निर्णय” है और जब तक इसमें कोई स्पष्ट अवैधता या दुर्भावना न हो, तब तक न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। इस मामले में ऐसी कोई स्थिति सामने नहीं आई।

‘प्रशासनिक फैसले में दखल नहीं’

अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक उपयोगिता से जुड़ी परियोजनाओं के लिए जगह तय करना न्यायालय का काम नहीं है। ऐसा हस्तक्षेप राज्य के विकास कार्यों में बाधा डाल सकता है और जरूरी बुनियादी ढांचे के निर्माण में देरी कर सकता है।

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि इस मामले में किसी वैधानिक या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। अदालत ने कहा कि किसी विशेष भूखंड के प्रति कुछ ग्रामीणों की पसंद, राज्य के प्रशासनिक विवेक से ऊपर नहीं हो सकती।

अंत में कोर्ट ने कहा कि स्कूल का स्थान तय करना प्रशासनिक जरूरत और योजना का विषय है, और इसमें न्यायालय को संयम बरतना चाहिए। चूंकि इस मामले में कोई वास्तविक जनहित या कानून का उल्लंघन नहीं पाया गया, इसलिए याचिका को खारिज कर दिया गया।

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करीब तीन दशकों तक चली एक लंबी कानूनी लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली को “स्पष्ट उदासीनता” बताया है। अदालत ने एक सरकारी कर्मचारी के मामले में न केवल तत्काल कैडर पुनःआवंटन (reallocation) का आदेश दिया, बल्कि राज्य सरकार पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। पूरी खबर पढ़ें…