बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार शिवसेना के पार्षद रमेश म्हात्रे को ज्यूडिशियल कस्टडी से रिहा करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने उन पर कई शर्तें भी लगाई हैं। पार्षद रमेश म्हात्रे पर कल्याण-डोम्बिवली नगर निगम के एक अस्पताल में डॉक्टरों और कर्मचारियों पर कथित हमले का आरोप है।
एक्टिंग चीफ जस्टिस रविंद्र वी. घुगे और जस्टिस गौतम अंखड़ की खंडपीठ ने म्हात्रे की जमानत पर पहले लगाई गई रोक को हटा दिया। इसी के साथ अदालत ने आदेश दिया कि जब तक पुलिस इस मामले में आरोपपत्र दाखिल नहीं कर देती, तब तक तुम्हें महाराष्ट्र के बाहर रहना होगा।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने आदेश दिया कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट को सौंपी जाए और राज्य को आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए समय सीमा भी निर्धारित की। पीठ ने निर्वाचित प्रतिनिधि के खिलाफ आरोपों की गंभीरता पर भी जोर दिया।
कोर्ट ने आगे कहा कि लोकतंत्र के शासन में यह सिद्धांत निहित है कि निर्वाचित प्रतिनिधि जनता द्वारा और जनता के लिए होता है। यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि पर अपने ही मतदाताओं पर हमला करने का आरोप लगता है, तो ऐसी स्थिति लोकतंत्र की नींव को निश्चित रूप से नुकसान पहुंचाएगी।
6 जुलाई, 2026 को म्हात्रे ने डॉक्टरों पर किया था हमला
म्हात्रे को पिछले महीने की शुरुआत में कल्याण-डोम्बिवली नगर निगम (केएमडीसी) के शास्त्री नगर अस्पताल में 6 जुलाई, 2026 को डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों पर कथित तौर पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
हालांकि, 14 जुलाई को सेशन कोर्ट ने पार्षद को जमानत दे दी थी। सेशन कोर्ट के इस फैसले के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया और जमानत पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद 18 जुलाई को म्हात्रे ने आत्मसमर्पण कर दिया। जिसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच की जिम्मेदारी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंपा था।
म्हात्रे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा ने शुक्रवार यानी आज यह निवेदन किया कि उनके मुवक्किल निष्पक्ष और न्यायसंगत सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए शर्तों का पालन करेंगे और उन्होंने महाराष्ट्र के बाहर स्थित अपने निवास स्थान का विवरण भी प्रदान किया।
उन्होंने अदालत को बताया कि म्हात्रे मुकदमे की शुरुआत तक गोवा में रहेंगे और अंजुना पुलिस स्टेशन में साप्ताहिक रूप से रिपोर्ट करेंगे। इसके बाद पीठ ने हिरासत में बिताए गए समय को ध्यान में रखते हुए उनकी रिहाई का निर्देश दिया। कोर्ट ने म्हात्रे और मामले के सह-आरोपियों को पीड़ित, गवाहों, उनके रिश्तेदारों, दोस्तों या मामले से जुड़े किसी भी व्यक्ति से संपर्क न करने का निर्देश दिया।
अदालत ने म्हात्रे को मामले में आरोपपत्र दाखिल होने के बाद महाराष्ट्र लौटने की अनुमति भी दी। अदालत ने आरोपियों को मुकदमे में सहयोग करने और अनावश्यक स्थगन की मांग न करने का भी आदेश दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी उल्लंघन की स्थिति में जमानत रद्द करने के लिए तुरंत अदालत के समक्ष सूचना प्रस्तुत की जानी चाहिए।
न्यायालय ने रजिस्ट्री को सात दिनों के भीतर त्वरित सुनवाई के लिए एक न्यायाधीश नियुक्त करने का निर्देश दिया। इसने राज्य की फोरेंसिक प्रयोगशाला को 15 कार्य दिवसों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया। आरोप पत्र 10 दिनों के भीतर दाखिल किया जाना चाहिए और उसके पांच कार्य दिवसों बाद आरोप तय किए जाने चाहिए। पीठ ने आगे आदेश दिया कि राज्य को एक अनुभवी विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करना होगा, जिसे न्यायालय की अनुमति के बिना बदला नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ SIT जांच की मांग वाली याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक वकील की याचिका को खारिज कर दिया। वकील ने दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा से जुड़े ‘जले हुए नोट’ मामले को लेकर एफआईआर दर्ज करने और एसआईटी द्वारा अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग की गई थी। पढ़ें पूरी खबर।
