तेलंगाना में एक उम्रकैद की सजा पाए कैदी का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1983 में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाला एक कैदी पैरोल पर जेल से बाहर आया और फिर वापस नहीं लौटा। इसके बाद वह करीब 40 साल तक पुलिस और जेल प्रशासन की पकड़ से बाहर रहा।
इस दौरान उसने कथित तौर पर अपनी पहचान और आपराधिक अतीत छिपाकर सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल की। इतना ही नहीं, उसने वर्षों तक नौकरी की और 2013 में सेवानिवृत्त भी हो गया। 2004 में उसे कथित तौर पर ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड भी मिला। आखिरकार मई 2024 में एक विशेष टास्क फोर्स ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
1983 में मिली थी उम्रकैद की सजा
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, आरोपी को 1983 में हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उसे 17 दिसंबर 1983 को 30 दिनों की पैरोल पर जेल से बाहर जाने की अनुमति मिली थी।
बाद में पैरोल की अवधि बढ़ाकर 17 मार्च 1984 तक कर दी गई। उसे 18 मार्च 1984 को जेल में वापस रिपोर्ट करना था, लेकिन वह वापस नहीं लौटा। इसके बाद उसने कथित तौर पर अपनी गिरफ्तारी से बचते हुए चार दशक से ज्यादा समय जेल के बाहर बिताया।
जेल से बाहर रहा और सरकारी नौकरी भी कर ली
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इतने लंबे समय तक फरार रहने के बावजूद वह सामान्य जिंदगी जीता रहा। उसकी पत्नी ने अदालत में दावा किया कि उसके पति ने सरकारी शिक्षक के तौर पर नौकरी की और 2013 में सेवानिवृत्त हुआ।
याचिका में यह भी बताया गया कि 2004 में उसे ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड मिला था। यानी जिस व्यक्ति को उम्रकैद की सजा हुई थी, वह करीब चार दशकों तक जेल से बाहर रहकर सरकारी सेवा करता रहा और सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच गया।
2024 में विशेष टास्क फोर्स ने पकड़ा
लगभग 40 साल तक उसका कोई पता नहीं चल सका। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पैरोल की अवधि खत्म होने के बाद उसके वापस नहीं लौटने पर पुलिस अधिकारियों को कई पत्र भेजे गए थे। बाद में उसे पकड़ने के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन किया गया। आखिरकार 16 मई 2024 को विशेष टास्क फोर्स ने उसे गिरफ्तार कर लिया और बाद में केंद्रीय जेल भेज दिया गया।
पत्नी ने पैरोल पर रोक को दी चुनौती
गिरफ्तारी के बाद कैदी की पत्नी ने तेलंगाना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत उसके पति की करीब 27 दिनों की अर्जित रिमिशन को जब्त कर लिया गया था। साथ ही, उसे तीन साल तक पैरोल और फर्लो नहीं देने का फैसला किया गया था। याचिका में पत्नी की ओर से दलील दी गई कि अधिकारियों ने करीब 40 साल की देरी के बाद कार्रवाई की। मेडिकल आधार पर भी पैरोल देने की मांग की गई।
‘पैरोल कैदियों का अधिकार नहीं’
तेलंगाना हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पैरोल को कैदी का पूर्ण अधिकार मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कैदी पैरोल को अधिकार के तौर पर मांग नहीं सकता। अदालत ने यह भी माना कि संबंधित व्यक्ति ने पैरोल की अवधि खत्म होने के बाद स्वेच्छा से जेल में रिपोर्ट नहीं की।
उसने जानबूझकर गिरफ्तारी से बचने की कोशिश की और सरकारी शिक्षक के रूप में काम करने के लिए अपनी सजा और दोषसिद्धि को छिपाया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकारी नौकरी हासिल करने का उसका दावा इस ओर इशारा करता है कि उसने अपनी दोषसिद्धि छिपाकर ‘धोखे’ से सरकारी रोजगार हासिल किया।
‘जिंदगी का सबसे अहम दौर जेल से बाहर बिताया’
हाई कोर्ट ने मामले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कैदी अपनी जिंदगी का महत्वपूर्ण और प्रमुख हिस्सा जेल से बाहर बिताने में सफल रहा और उसने इस दौरान सभी लाभों का आनंद लिया।
हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन पर उठाए सवाल
जस्टिस टी. माधवी देवी की पीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि 40 साल तक किसी कैदी को ट्रैक न कर पाना जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। खासकर तब, जब पैरोल पर बाहर आने के बाद वह सरकारी नौकरी करने और सेवानिवृत्त होने तक सामान्य जीवन जीता रहा।
जेल प्रशासन के लिए ट्रैकिंग सिस्टम बनाने का आदेश
मामले को केवल संबंधित कैदी तक सीमित न रखते हुए अदालत ने भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए। तेलंगाना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को पैरोल पर छोड़े गए कैदियों की निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था और जरूरी दिशानिर्देश तैयार करने को कहा।
अदालत ने अधिकारियों को पैरोल पर बाहर गए कैदियों की कड़ी निगरानी के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित करने का भी निर्देश दिया, ताकि पैरोल की अवधि समाप्त होने के बाद कैदी समय पर जेल में वापस रिपोर्ट करें। अदालत ने चेतावनी दी कि इस तरह की लापरवाही दूसरे कैदियों को भी पैरोल का गलत फायदा उठाकर लंबे समय तक फरार रहने के लिए प्रेरित कर सकती है।
मेडिकल आधार पर भी नहीं मिली राहत
कैदी की ओर से मेडिकल आधार पर पैरोल की मांग भी की गई थी। हालांकि, अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जेल में मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध हैं, जैसा कि राज्य सरकार ने अपने जवाब में बताया है।
सभी दलीलों पर विचार करने के बाद तेलंगाना हाई कोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज कर दी। साथ ही, पैरोल पर छोड़े जाने वाले कैदियों की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया।
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