जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने एक पूर्व स्पेशल पुलिस अधिकारी की सेवा बहाली की याचिका करते हुए सख्त टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पुलिसकर्मी आतंकियों के डर से ड्यूटी पर आना बंद करे, तो इस देश को केवल भगवान ही बचा सकता है।

जस्टिस संजय धर ने में कहा कि याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया है कि वह आतंकियों की धमकियों के कारण ड्यूटी पर नहीं आया। ऐसे में उसकी सेवा समाप्त करने का फैसला उचित था।

10 अगस्त के आदेश में कहा गया, “किसी भी रैंक का पुलिस अधिकारी, यदि वह आतंकियों से डरकर अपनी ड्यूटी निभाने से इनकार कर दे तो इस देश को केवल भगवान ही बचा सकता है। ड्यूटी पर न आने के लिए याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया कारण स्वीकार्य नहीं है।”

याचिकाकर्ता को 2012 में स्पेशल पुलिस अधिकारी (SPO) के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने दावा किया कि 2015 में जब अशांति फैली हुई थी, तब वे चिकित्सा अवकाश पर थे और उन्हें आतंकियों से जान से मारने की धमकियां मिलीं। उन्होंने कहा कि धमकियों के कारण वे ड्यूटी पर वापस नहीं लौट सके और बाद में जब उन्होंने अपनी पोस्टिंग पर रिपोर्ट किया तो उन्हें दोबारा ड्यूटी पर नहीं लिया गया।

जब उनकी बहाली की अपीलें खारिज हो गईं तो उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया। 2025 में न्यायालय ने जम्मू और कश्मीर के पुलिस महानिदेशक को उनके मामले पर विचार करने और एक स्पष्ट आदेश पारित करने का निर्देश दिया। जब पुलिस प्रमुख ने उनकी पुनः सेवा में शामिल होने की अपील को अस्वीकार कर दिया, तो उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि उनकी सेवाएं बिना किसी जांच, औपचारिक आरोप या सुनवाई का अवसर दिए समाप्त कर दी गईं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 16 (सरकारी रोजगार में समान अवसर), 21 (जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षण) और 311 (नागरिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों की बर्खास्तगी, पदच्युति या पद में कमी) तथा जम्मू और कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 359 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया। याचिका में कहा गया है कि किसी भी पुलिस अधिकारी को कारण बताने का अवसर दिए बिना बर्खास्त या उसे पद से नहीं हटाया जा सकता।

‘सुनवाई का कोई अधिकार नहीं’

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि वह एक विशेष लोक सूचना अधिकारी (एसपीओ) के रूप में कार्यरत था। अपने कर्तव्यों की प्रकृति के कारण सुनवाई या जांच के किसी भी अधिकार का हकदार नहीं।

अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ता का यह तर्क कि पुलिस अधिनियम की धारा 19 में निहित प्रावधानों के मद्देनजर एक एसपीओ को पुलिस के साधारण अधिकारियों के समान शक्तियां, विशेषाधिकार और संरक्षण प्राप्त हैं, निराधार प्रतीत होता है क्योंकि एसपीओ किसी भी वैधानिक नियमों द्वारा विनियमित कोई भी नागरिक पद धारण नहीं करते हैं।”

न्यायाधीश ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता को सुनवाई का अधिकार भी मान लिया जाए, तो भी आतंकियों की धमकियों के कारण कर्तव्य पर न आने की उसकी स्वीकारोक्ति ही उसकी सेवा समाप्त करने का पर्याप्त कारण है। न्यायालय ने कहा कि सेवा से बर्खास्तगी से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर देना मात्र एक औपचारिकता होती। इसी के साथ हाई कोर्ट ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया।

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