Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा कि उत्तर प्रदेश (UP) में पुलिस अधिकारी संविधान के बजाय सत्ताधारी सरकार के प्रति ज़्यादा वफादार हैं। यूपी पुलिस के कामकाज की कड़ी आलोचना करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर ने कहा कि उत्तर प्रदेश में नेताओं और नौकरशाहों की सामंती सोच ने लंबे समय से संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय निजी प्रभुत्व का जरिया बना दिया है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा, राज्य की प्रशासनिक मशीनरी गहरी राजनीतिक पैठ के प्रति संवेदनशील रही है। इसमें कहा गया है कि यूपी में अधिकारियों के ट्रांसफर, पोस्टिंग और पदोन्नति योग्यता-आधारित शासन के बजाय राजनीतिक संरक्षण के साधन हैं।

बेंच ने कहा कि वफादार माने जाने वाले अधिकारियों को पसंदीदा पोस्टिंग-अर्बन कमिश्नरेट, आकर्षक जिले से पुरस्कृत किया जाता है, जबकि स्वतंत्रता का प्रदर्शन करने वालों को दंडात्मक रूप से महत्वहीन कार्यों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, यह एक सर्वविदित तथ्य है।

अधिकारियों की वफादारी सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति होती है- कोर्ट

कोर्ट ने आगे कहा, “अधिकारियों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति होती है। फील्ड अधिकारी, जो ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल को अच्छी तरह समझते हैं, अपने व्यवहार को राजनीतिक आकाओं को खुश करने के हिसाब से ढालते हैं। एनकाउंटर में हत्याएं, चुनिंदा लोगों पर कार्रवाई और परेशान करने वाले लोगों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल जैसे मामलों पर समय-समय पर अदालतों का ध्यान गया है।”

उत्तर प्रदेश में पुलिस के कामकाज और कानून के शासन पर कड़ी टिप्पणी करते हुए जस्टिस दिवाकर ने कहा, “अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग कानून के शासन को संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि काम-काज में आने वाली एक रुकावट मानता है। बिना सही प्रक्रिया के गिरफ्तारियां की जाती हैं, कई बार गलत इरादों से एफआईआर दर्ज की जाती हैं या दबा दी जाती हैं और अधिकारियों की मनमर्जी से एहतियातन हिरासत के प्रावधानों का मनमाना इस्तेमाल किया जाता है।”

बेंच ने आगे कहा, ‘कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर’ (और अब ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’) के तहत मिलने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। अदालती आदेशों का पालन सिर्फ दिखावे के लिए किया जाता है, लेकिन असल में उनका मकसद पूरा नहीं होने दिया जाता।”

किस मामले में की टिप्पणी

न्यायालय ने ये टिप्पणियां उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान कीं। गैंगस्टर विरोधी कानून के तहत मामला दर्ज एक आरोपी द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान, न्यायालय ने राज्य में पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग का गंभीर संज्ञान लिया।

चूंकि सर्वोच्च न्यायालय 1986 के अधिनियम से जुड़े मुद्दों पर भी विचार कर रहा है, इसलिए न्यायमूर्ति दिवाकर ने न्यायालय द्वारा संज्ञान में लिए गए मुद्दों पर कोई आखिरी फैसला देने से परहेज किया। हालांकि, न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस की विभिन्न खामियों को उजागर किया।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कुछ दिन पहले मेंटेनेस से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महिला को दिए जाने वाले मासिक भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की रकम 1000 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये करने के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में किसी महिला के लिए मात्र 1000 रुपये प्रति माह में अपना गुजारा करना असंभव है। यहां क्लिक कर पढे़ं पूरी खबर…