ओडिशा में चार साल पहले एक महिला ने अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया था। लेकिन बच्चे के जन्म के तीन दिन बाद उसके पति ने उसकी बेरहमी से हत्या कर दी। आरोपी ने महिला पर चाकू से 49 वार किए थे।
इतना ही नहीं, आरोपी ने अपनी छह साल की बेटी की भी गला काटकर हत्या करने की कोशिश की और इसके बाद मौके से फरार हो गया। पुलिस ने बाद में उसे गिरफ्तार किया। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को मौत की सजा सुनाई थी।
अब आरोपी की अपील पर ओडिशा हाईकोर्ट ने उसकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि आरोपी को कम से कम 35 साल जेल में रहना होगा। इसके बाद ही उसकी रिहाई पर विचार किया जा सकता है।
जस्टिस मनाश रंजन पाठक और जस्टिस शशिकांत मिश्रा की बेंच ने माना कि अपराध बेहद बर्बर और क्रूर था, लेकिन यह ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में नहीं आता, जिसमें मौत की सजा दी जा सके।
कोर्ट ने कहा कि यह कल्पना करना मुश्किल है कि दोषी करीब 10 साल और जेल में रहने के बाद वापस अपने घर लौटे, जहां उसकी बेटियां हैं और जिनमें से एक की उसने हत्या की कोशिश की थी।
अदालत ने दोनों बच्चियों की कम उम्र को देखते हुए कहा कि माता-पिता के बिना उनका भविष्य सुरक्षित करना जरूरी है। दोनों बच्चियों की उम्र फिलहाल 10 और 4 साल है। कोर्ट ने इसी मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने का फैसला किया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पैसों से बच्चियों के माता-पिता को खोने का दर्द और जिंदगी भर रहने वाले मानसिक आघात को खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन पर्याप्त मुआवजा उनके भविष्य को सुरक्षित करने और उन्हें बेहतर जिंदगी बनाने में मदद कर सकता है।
इसी को देखते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को दोनों बच्चियों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। इससे पहले जिला विधिक सेवा प्राधिकरण यानी DLSA की ओर से दोनों बच्चियों को 5-5 लाख रुपये दिए गए थे। यह रकम बच्चियों के बालिग होने तक फिक्स्ड डिपॉजिट में रखी जाएगी।
49 बार चाकू से हमला, लेकिन मौत की सजा क्यों नहीं?
बचाव पक्ष ने कोर्ट में दलील दी कि ज्यादातर चाकू के वार शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर किए गए थे, लेकिन वे बहुत गहरे नहीं थे। आरोपी का कोई स्पष्ट हत्या का मकसद भी नहीं था और हत्या की पहले से कोई साजिश नहीं थी।
बचाव पक्ष ने दावा किया कि घरेलू विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। आरोपी ने कथित तौर पर बेकाबू गुस्से में आकर यह कदम उठाया और उस समय वह अस्थायी मानसिक असंतुलन की स्थिति में था।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जेल में उसका व्यवहार भी अच्छा रहा है। इससे उसके सुधरने की संभावना दिखती है। इसलिए उसे मौत की सजा देना उचित नहीं होगा।
वहीं, अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि महिला पर हमला करने से लेकर छह साल की बच्ची की हत्या की कोशिश तक आरोपी की पूरी कार्रवाई बेहद क्रूर और बर्बर थी। इसलिए यह मामला “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” यानी दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में आता है और मौत की सजा बरकरार रखी जानी चाहिए।
35 साल से पहले सजा में राहत नहीं
हाईकोर्ट ने साफ किया कि आरोपी को कम से कम 35 साल जेल में रहना होगा। इससे पहले उसे कानून के तहत सजा में छूट यानी रिमिशन का लाभ देने पर विचार नहीं किया जाएगा। हालांकि, जेल में पहले से बिताई गई अवधि को इन 35 सालों की सजा में शामिल किया जाएगा।
30 दिन की मिली पैरोल, 40 साल तक नहीं लौटा जेल!
तेलंगाना में एक उम्रकैद की सजा पाए कैदी का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1983 में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाला एक कैदी पैरोल पर जेल से बाहर आया और फिर वापस नहीं लौटा। इसके बाद वह करीब 40 साल तक पुलिस और जेल प्रशासन की पकड़ से बाहर रहा। पढ़ें पूरी खबर।
