Odisha News: ओडिशा हाईकोर्ट ने हाल में खाद्य आपूर्ति और उपभोक्ता कल्याण विभाग के एक उपसचिव को कड़ी फटकार लगाई और कोर्ट के आदेश पालन न करने के चलते याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। याचिकाकर्ता ने वेतन संशोधन के मुद्दे पर याचिका लगाई थी, जिसके बाद फैसला देते हुए कोर्ट ने अधिकारी को वेतन बढ़ाने के आदेश भी दिए थे। कोर्ट के इस आदेश का पालन करना उप सचिव को भारी पड़ा।
ओडिशा हाई कोर्ट के जस्टिस कृष्णा श्रीपाद और जस्टिस चितरंजन डैश की बेंच ने हालांकि कोर्ट की अवमानना वाले मामले को समाप्त कर दिया लेकिन उस पर 1 लाख का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने कहा कि अवमानना करने वाले के रवैये पर कड़ाई से अंकुश लगाना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता के वेतन बढ़ाने के मामले में कोर्ट ने इसके हक में फैसला सुनाया था। इसके बावजूद सैलरी न बढ़ने पर 23 मार्च को पारित अपने आदेश में अदालत ने कहा, “हालांकि अवमानना की कार्यवाही समाप्त की जाती है, लेकिन मामले में की गई ‘आपराधिक’ देरी के लिए अवमाननाकर्ता चार सप्ताह के भीतर अपनी जेब से शिकायतकर्ता को 1,00,000 रुपये की राशि का भुगतान करेगा।”
क्या है आपराधिक देरी का मामला?
हाईकोर्ट ने कहा कि लंबा समय बीत जाने के बावजूद कोई फैसला नहीं लिया गया। 19 फरवरी, 2026 को एक निर्णय लिया गया और देरी के औचित्य के रूप में एक अप्रासंगिक स्पष्टीकरण पेश किया गया। यह अवमाननाकर्ता द्वारा देरी करने का एक आपराधिक मामला है, जिसने बहुत देर से निर्णय लिया और उसकी एक कॉपी 23 फरवरी, 2026 को शिकायतकर्ता को दी।
कोर्ट ने कहा कि अवमाननाकर्ता का आचरण दर्शाता है कि उसके मन में संवैधानिक न्यायालय के आदेशों के प्रति बहुत कम सम्मान, या कहें कि बिल्कुल भी सम्मान नही है। इसे हमारे हाथों से बिना सज़ा के नहीं जाने दिया जा सकता। ऐसे रवैये के खिलाफ कदम उठाने ही होंगे, जिससे अवमाननाकर्ता को अपनी जेब से भारी कीमत चुकानी पड़े।
अधिकारी के खिलाफ सख्त हाईकोर्ट
अदालत ने आदेश दिया कि अवमाननाकर्ता चार सप्ताह के भीतर अपनी जेब से शिकायतकर्ता को 1 लाख रुपये का भुगतान करेगा। यदि वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो पहले महीने के लिए 500 रुपये प्रति दिन और उसके बाद के दिनों के लिए 1,000 रुपये प्रति दिन की अतिरिक्त राशि देय होगी। शिकायतकर्ता के लिए यह विकल्प खुला है कि वह कानून के अनुसार कहीं और इस अनुपालन आदेश को चुनौती दे सकता है।
वेतन संशोधन याचिका से जुड़ा है पूरा मामला
देबाशीष नायक नाम के एक याचिकाकर्ता ने इससे पहले अपनी नियुक्ति की तारीख से वेतन में बढ़ोतरी की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता द्वारा वेतन में बढ़ोतरी की मांग संशोधित न्यायिक वेतनमान, 2022 और ओडिशा उपभोक्ता संरक्षण नियम, 2020 के नियम-4 के अनुसार मांगा गया था।
इसके बाद अदालत ने 2024 में एक आदेश पारित कर खाद्य आपूर्ति और उपभोक्ता कल्याण विभाग के उप सचिव को तीन महीने के भीतर कानून के अनुसार निर्णय लेने और उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया था। अदालत ने उप सचिव को निर्णय लेने के दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को आदेश की जानकारी देने का भी निर्देश दिया था। पीठ के समक्ष कुछ सुधार मांगे गए थे, जिन्हें स्वीकार कर लिया गया था। हालांकि, तय समय सीमा के भीतर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसके चलते ही याचिकाकर्ता ने फिर उच्च न्यायालय में अवमानना की शिकायत दर्ज कराई।
नोटिस मिलने के बाद अधिकारी पेश हुए और अनुपालन हलफनामा दायर किया। इसमें कहा गया कि प्रतिनिधित्व पर विचार किया गया है और सुप्रीम कोर्ट के कुछ हालिया फैसलों के मद्देनजर सरकार के नए फैसले का इंतजार किया जा रहा है। हालांकि, अदालत ने कहा कि देरी के लिए दिया गया यह स्पष्टीकरण अप्रासंगिक था।
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कर्नाटक हाई कोर्ट ने गुरुवार को कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सहित अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा है। यह मामला मैसूरु शहरी विकास प्राधिकरण (MUDA) भ्रष्टाचार केस से जुड़ा है। इस केस में सिद्धारमैया, उनकी पत्नी और दो अन्य लोगों के खिलाफ जांच को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई है। पढ़िए पूरी खबर…
