ओडिशा हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में वयस्क महिलाओं की आजादी को लेकर बड़ी बात कही। फैसला वयस्क महिलाओं की आजादी को मजबूत करता है। कोर्ट ने कहा है कि अब कोई भी माता-पिता या ससुराल वाले अपनी वयस्क बेटी को अपने घर या ससुराल में रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। अगर महिला खुद से स्वतंत्र रूप से किसी अन्य जगह रहने का फैसला करती है, तो यह उसका कानूनी अधिकार है।

यह फैसला उस मामले में आया, जिसमें एक मां ने अपने विवाहित बेटी की तलाश के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। बेटी ने माता-पिता और ससुराल वालों यानी दोनों के घरों से अलग रहना चुना था। 9 मार्च को सुनाए गए आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी कानूनी प्रावधान के तहत माता-पिता या ससुराल वाले वयस्क महिला को अपने घर में रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

कोर्ट ने कहा कि वयस्क महिला की व्यक्तिगत आजादी में यह भी शामिल है कि वह खुद तय करे कि वह कहां और किसके साथ रहेगी। कोर्ट के अनुसार, “वयस्क महिला को स्वतंत्र रूप से रहने में कोई कानूनी रोक नहीं है।”

महिला ने स्वेच्छा से अपनी ससुराल छोड़कर दूसरी जगह चली गई है

याचिका में बताया गया कि महिला ने स्वेच्छा से अपने ससुराल का घर छोड़ दिया था और किसी गुप्त स्थान पर रह रही थी। उसका पति के साथ वैवाहिक विवाद अभी सिविल कोर्ट में चल रहा है।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि 2024 में महिला पुलिस के सामने आकर स्पष्ट रूप से कह चुकी थी कि वह न तो अपने माता-पिता के घर रहेगी और न ही ससुराल में रहेगी। इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने कोर्ट से कहा कि उन्हें बेटी का एक साल से कोई पता नहीं है और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने देखा कि महिला को किसी ने अवैध रूप से रोका या बंधक नहीं बनाया है। चूंकि वह वयस्क है और खुद से स्वतंत्र रहने का निर्णय ले चुकी है, इसलिए याचिका को मानने का कोई आधार नहीं था। इसलिए, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और किसी भी निर्देश जारी करने से इंकार कर दिया।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांत को दोबारा मजबूत करता है। यह स्पष्ट करता है कि वयस्क महिलाओं को भी अन्य वयस्क नागरिकों की तरह अपने जीवन और रहने की जगह तय करने का बिना किसी पारिवारिक दबाव के पूरा अधिकार है।

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पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महिला को उसकी किशोर सौतेली बेटी की आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराए जाने के बाद बरी कर दिया है। महिला की अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस रुपिंदरजीत चहल ने 2003 के मामले में उसकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि लड़की की मौत आत्महत्या थी या सौतेली मां ने उसे उकसाया था। लड़की हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक गांव की रहने वाली थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक