दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को बीजू जनता दल के पूर्व लोकसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता पिनाकी मिश्रा के खिलाफ आपराधिक मानहानि की कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई पर्याप्त सबूत नहीं थे।
बुधवार को सार्वजनिक किए गए इस आदेश को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने पारित किया। जिन्होंने कहा कि आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से न्याय के उद्देश्य को आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा और इसके बजाय पर्याप्त आधारभूत सामग्री के अभाव में पिनाकी मिश्रा को आपराधिक मुकदमे की कठोरता का सामना करना पड़ेगा।
यह मामला अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह द्वारा दायर शिकायत से शुरू हुआ। सिंह ने अगस्त 2018 में दिल्ली बार काउंसिल के समक्ष पिनाकी मिश्रा पर पेशेवर कदाचार का आरोप लगाया था। शिकायत में कहा गया था कि पिनाकी मिश्रा ने ई-कचरा नियमों पर विरोधाभासी रुख अपनाया था। पहले एक संसदीय समिति के समक्ष और बाद में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में बिजली वितरण कंपनियों का प्रतिनिधित्व करते हुए। मिश्रा ने इन आरोपों से इनकार किया और जवाब में सिंह को धोखेबाज और ब्लैकमेलर कहा।
इसके बाद अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह ने 2019 में पटियाला हाउस स्थित मजिस्ट्रेट कोर्ट में पिनाकी मिश्रा के खिलाफ मानहानि की कार्यवाही की मांग करते हुए दो आपराधिक शिकायतें दर्ज कराईं। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पिनाकी मिश्रा को दोनों मामलों में 20 अप्रैल, 2019 को सुनवाई के लिए तलब किया।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी अन्य व्यक्ति के बयान या किसी अन्य रूप में ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जिससे प्रथम दृष्टया यह सिद्ध हो सके कि कथित आरोप से सिंह की प्रतिष्ठा को कोई ठेस पहुंची है। न्यायालय ने आगे कहा कि गवाही से पहले की कार्यवाही के दौरान सिंह ने केवल स्वयं को ही गवाह के रूप में पेश किया था। साथ ही प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के मात्र दावे से आपराधिक मानहानि की कार्यवाही शुरू करने के लिए आवश्यक कानूनी मानदंड पूरा नहीं होता।
सिद्धार्थ सिंह का मामला डेलीहंट की एक ऑनलाइन रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें पिनाकी मिश्रा के हवाले से उन्हें धोखेबाज कहा गया था। पिनाकी मिश्रा ने इस तरह का कोई भी इंटरव्यू देने से इनकार किया और मार्च 2019 में ओडिशा पोस्ट के संपादक को लिखे अपने पत्र का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने इसी आधार पर स्पष्टीकरण प्रकाशित करने की मांग की थी।
अदालत ने यह भी पाया कि मजिस्ट्रेट ने प्रकाशन या संबंधित रिपोर्टर की जांच नहीं की थी। एक ऐसा कदम जिससे कम से कम प्रथम दृष्टया यह साबित हो सकता था कि पिनाकी मिश्रा ने वास्तव में वह बयान दिया था। इसकी अनुपस्थिति में अदालत को पिनाकी मिश्रा से उन टिप्पणियों को जोड़ने वाला कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिला।
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