बॉम्बे हाई कोर्ट ने 28 जुलाई को मुंबई पुलिस द्वारा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ जारी निष्कासन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को न गिराए जाने के पक्ष में राय व्यक्त करना राष्ट्र-विरोधी नहीं माना जा सकता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या याचिकाकर्ताओं को उनके धर्म के कारण निशाना बनाया जा रहा है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, जज जस्टिस माधव जामदार ने टिप्पणी की, “उनके अनुसार, बाबरी मस्जिद को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए था, यह उनकी धारणा है! यह राष्ट्रविरोधी कैसे हो सकता है? यह राष्ट्रविरोधी नहीं हो सकता! यह उनकी धारणा है! हर किसी को अपना अधिकार है।” अदालत ने आगे पूछा, “सिर्फ इसलिए कि वे एक धर्म से संबंध रखते हैं, क्या उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है?”

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों से उत्पन्न एफआईआर के आधार पर दोनों व्यक्तियों के खिलाफ जारी किए गए निष्कासन आदेश कानून की दृष्टि से अस्थिर प्रतीत होते हैं, विशेष रूप से तब जब अन्य राजनीतिक दलों ने भी उन्हीं प्रदर्शनों में भाग लिया था। अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि यह कार्रवाई चयनात्मक प्रतीत होती है और मुस्लिम समुदाय से संबंधित दोनों याचिकाकर्ताओं के धर्म से प्रभावित है।

जज ने पूछा- क्या सिर्फ इसलिए कि वे एक धर्म से संबंधित हैं

न्यायाधीश ने कहा, “एफआईआर सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ है, लेकिन इन याचिकाकर्ताओं को ही निशाना बनाया गया है। चुनिंदा तरीके से कार्रवाई नहीं की जा सकती। क्या आपने कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक कार्यकर्ताओं, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के खिलाफ कार्रवाई की है? क्या सिर्फ इसलिए कि वे एक धर्म से संबंधित हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है?”

न्यायालय ने यह भी कहा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए था, इस बारे में राय व्यक्त करना राष्ट्रविरोधी नहीं है और एक नागरिक को इस मुद्दे पर ऐसी राय रखने का अधिकार है। सिर्फ इसलिए कि वे एक धर्म से संबंध रखते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है?

याचिकाकर्ताओं, फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी ने 3 दिसंबर, 2025 के निष्कासन आदेशों को चुनौती दी थी। जिसके तहत उन्हें एक वर्ष के लिए मुंबई में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया था। ये आदेश वक्फ विधेयक के विरोध प्रदर्शन, चेंबूर-गोवंडी में सीमेंट गोदामों से होने वाले वायु प्रदूषण और बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित 2024 और 2025 में दर्ज तीन एफआईआर पर आधारित थे।

सदस्यों की ओर से पेश हुए अधिवक्ता इब्राहिम हरबत ने तर्क दिया कि कथित कृत्यों में से कोई भी महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 के अंतर्गत नहीं आता है, जो ऐसे मामलों में निष्कासन की अनुमति देता है जहां यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत हों कि अपराधों से व्यक्तियों या संपत्ति को खतरा होने की संभावना है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने कहा कि एफआईआर में केवल नारेबाजी का जिक्र था और इसमें व्यक्तियों या सार्वजनिक संपत्ति को किसी भी प्रकार की क्षति का संकेत नहीं दिया गया था। न्यायाधीश ने बाबरी मस्जिद मुद्दे से जुड़े एक विरोध प्रदर्शन पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मस्जिद को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए था, इस विचार को राष्ट्रविरोधी नहीं माना जा सकता।

यह राष्ट्रविरोधी कैसे हो सकता है- जज

जज ने टिप्पणी की, “उनके अनुसार, बाबरी मस्जिद को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए था, यह उनकी धारणा है! यह राष्ट्रविरोधी कैसे हो सकता है? यह राष्ट्रविरोधी नहीं हो सकता! यह उनकी धारणा है! हर किसी को अपना अधिकार है।” उनके अनुसार बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था, यही उनकी धारणा है! यह राष्ट्रविरोधी कैसे हो सकता है? यह राष्ट्रविरोधी हो ही नहीं सकता।

मुख्य लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने आरोपियों के प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से कथित संबंधों का जिक्र किया, जिसे आरोपियों ने नकार दिया। हालांकि, अदालत ने कहा कि ऐसे आरोप कारण बताओ नोटिस का हिस्सा नहीं थे और उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

हिराय ने आगे तर्क दिया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान याचिकाकर्ताओं का आचरण सामाजिक असामंजस्य को भड़का सकता है और शांति भंग का कारण बन सकता है। हालांकि, अदालत ने पाया कि काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने पूछा कि मौलिक अधिकारों के संबंध में, शब्दों का गलत अर्थ निकालने की कोई जरूरत नहीं है! मौलिक अधिकार तो मौजूद हैं! नागरिकों के मौलिक अधिकार इस तरह कैसे प्रभावित हो सकते हैं?

न्यायालय ने यह भी दोहराया कि निष्कासन एक असाधारण उपाय है जो स्वतंत्र आवागमन के मौलिक अधिकार को सीमित करता है और इसे वैधानिक आवश्यकताओं का सख्ती से पालन करना चाहिए। न्यायालय ने इस स्थापित कानूनी स्थिति को भी ध्यान में रखा कि जिन अपराधों की अभी जांच चल रही है, वे इस तरह की कार्रवाई का आधार नहीं बन सकते।

इसमें अन्य एसडीपीआई सदस्यों को इसी आधार पर राहत देने वाले अपने पूर्व आदेश का हवाला दिया गया। जस्टिस जामदार ने निष्कासन आदेश को रद्द किया। एसडीपीओ के एक पदाधिकारी के खिलाफ यह कहते हुए शिकायत दर्ज की गई कि इस कार्रवाई से उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और यह कार्रवाई केवल सरकारी निर्णयों के विरोध पर आधारित नहीं हो सकती। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में निष्कासन आदेश भी कानूनी रूप से अस्थिर थे और उसने उन्हें रद्द कर दिया।

‘थाने में पुलिस ने की मारपीट और बदसलूकी’, अब वकील ने सुप्रीम कोर्ट में की शिकायत

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को वकील माणिक गुप्ता ने शिकायत की कि दिल्ली पुलिस ने उनके साथ मारपीट और बदसलूकी की। यह घटना 23 जुलाई की है। जब वे निज़ामुद्दीन पुलिस थाने गए थे। वह जंतर-मंतर पर परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के कारण हिरासत में लिए गए छात्रों की रिहाई के लिए वहां गए थे। शिकायतकर्ता माणिक गुप्ता दिल्ली की विभिन्न अदालतों, जिनमें सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है, उसमें प्रैक्टिस करते हैं। गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस रिट याचिका में दखल देने की मांग की, जिसमें प्रदर्शनकारियों पर पुलिस बल के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया है। पढ़ें पूरी खबर।