अदालतों में फैसले आमतौर पर कानून की गंभीर भाषा में लिखे जाते हैं। लेकिन कभी-कभी किसी जज की एक टिप्पणी पूरे मामले को कानूनी दस्तावेज से निकालकर एक यादगार किस्से में बदल देती है। अमेरिका की कैलिफोर्निया कोर्ट ऑफ अपील में 1989 में आया McDonald v. John P. Scripps Newspapers भी ऐसा ही मामला था। यह कोई बड़ा संवैधानिक मुकदमा नहीं था। लेकिन फैसले में दर्ज एक असामान्य टिप्पणी ने इस सालों बाद भी चर्चा में रहने वाला courtroom anecdote बना दिया। इस मामले का कानूनी संदर्भ 257 Cal. Rptr. 473 (1989) है।

इस मामले का किस्सा सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी किताब ‘The Lawful and the Awful: Quirky Tales from the World of Law’ में शामिल किया है। मेहता ने इसे उन फैसलों में गिना है जिनकी भाषा पारंपरिक कानूनी शैली से हटकर थी। उनके वर्णन में अदालत ने पक्षकारों के व्यवहार पर ऐसी टिप्पणी की कि उन्हें जज से ज्यादा एक ‘किंडरगार्टन टीचर’ की जरूरत लगती है। जनसत्ता की ‘कोर्टरूम फाइल्स‘ सीरीज में बात आज इसी खास किस्से की…

आखिर मामला था क्या?

McDonald v. John P. Scripps Newspapers मूलतौर पर हर्जाने यानी damages से जुड़ा विवाद था। यह मामला कैलिफोर्निया कोर्ट ऑफ अपील तक पहुंचा और अदालत को यह तय करना था कि कथित नुकसान के लिए किस तरह के हर्जाने की कानूनी गुंजाइश बनती है। बाद के कानूनी मामलों में भी इस फैसले का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया कि सिर्फ अनुमान या संभावित नुकसान के आधार पर हर्जाना नहीं दिया जा सकता।

यानी मामला महज इस बात का नहीं था कि किसी पक्ष को नुकसान हुआ या नहीं। अदालत के सामने यह सवाल भी था कि किस नुकसान को कानून वास्तविक और साबित करने योग्य मानता है और किसे केवल अनुमान माना जाएगा। लेकिन इस केस की खासियत उसका कानूनी सिद्धांत भर नहीं था।

तुषार मेहता ने जिस प्रसंग को अपनी किताब में याद किया है, उसमें अदालत की भाषा ने मामले को अलग पहचान दे दी। सामान्य तौर पर जज किसी पक्ष के आचरण से असहमति जताते हैं तो भाषा बेहद संयमित रहती है। ‘दलील स्वीकार नहीं की जा सकती’, ‘आचरण उचित नहीं था’ या ‘दावा पर्याप्त प्रमाण पर आधारित नहीं है’-फैसलों में ऐसे वाक्य आम हैं।

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लेकिन इस सुनवाई के समय अंदाज कुछ अलग था। मेहता के मुताबिक, जज ने पक्षकारों के व्यवहार को देखकर टिप्पणी की- कि उन्हें अदालत के जज की नहीं बल्कि किंडरगार्टन के शिक्षक की जरूरत है।

यह एक ऐसा वाक्य था जिसमें अदालत की नाराजगी भी थी और व्यंग्य भी। किसी कानूनी विवाद में शामिल पक्षों की तुलना छोटे बच्चों से करना न्यायिक फैसले की सामान्य भाषा नहीं है। इसलिए यह टिप्पणी खुद मामले की कानूनी बहस से अलग एक यादगार प्रसंग बन गई।

अदालत को क्यों करनी पड़ी ऐसी टिप्पणी

लेकिन इस टिप्पणी को समझने के लिए एक बात महत्वपूर्ण है। अदालत का काम केवल यह तय करना नहीं है कि किस पक्ष की बात कानून के मुताबिक सही है। अदालत के सामने यह भी अपेक्षा रहती है कि मुकदमे की प्रक्रिया तथ्य, सबूत और कानून के दायरे में चले। जब विवाद उस सीमा से बाहर जाता हुआ दिखाई देता है तो न्यायाधीश की टिप्पणी कभी-कभी फैसले के कानूनी निष्कर्ष से ज्यादा याद रह जाती है।

इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ।

एक तरफ कानूनी सवाल था- नुकसान का दावा किस हद तक साबित किया जा सकता है। दूसरी तरफ अदालत के सामने पक्षकारों के बीच चल रहा विवाद था। इसके बाद जज की वह असाधारण टिप्पणी आई जिसने पूरे प्रसंग को कानूनी भाषा से निकालकर रोजमर्रा की जिंदगी की एक तस्वीर में बदल दिया।

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किंडरगार्टन की कक्षा में बच्चों के बीच होने वाला झगड़ा शायद अदालत की सबसे औपचारिक जगह से बिल्कुल उलट दुनिया है। लेकिन जज ने इसी तुलना के जरिए यह जताया कि उन्हें सामने चल रहा व्यवहार कितना बचकाना लगा। यही वह जगह है जहां यह मामला कानूनी किताब से निकलकर कोर्टरूम किस्सा बन जाता है।

McDonald v. John P. Scripps Newspapers का हवाला आज भी कानून की किताबों में मिलता है और इसे damages के कानूनी सिद्धांत के संदर्भ में उद्धृत किया गया है। लेकिन तुषार मेहता की किताब ने इसके एक दूसरे पहलू को सामने ला दिया- कानून की बेहद औपचारिक दुनिया में भी जज कभी-कभी ऐसी भाषा चुन लेते हैं जिसे पढ़कर फैसला याद रह जाए।

किसी मुकदमे में आखिरकार जीत-हार का फैसला कानून के आधार पर होता है। लेकिन अदालत के इतिहास में कुछ मामले अपने कानूनी निष्कर्ष से ज्यादा उस एक वाक्य के कारण टिक जाते हैं जो जज ने अपनी नाराजगी या बात समझाने के लिए लिख दिया।

इस अमेरिकी मुकदमे का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है।

एक तरफ damages का सवाल था, दूसरी तरफ अदालत की नजर में पक्षकारों का व्यवहार। और इन दोनों के बीच जज का वह वाक्य दर्ज हो गया जिसे तुषार मेहता ने दशकों बाद अपनी किताब में फिर से याद किया- ‘इन लोगों को जज नहीं, किंडरगार्टन टीचर चाहिए।’

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