राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) 2026 को दोबारा आयोजित करने के राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस संबंध में दायर जनहित याचिका (PIL) पर 17 जून को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई करेगी। याचिका ऐसे समय में दाखिल की गई है जब NTA ने कथित पेपर लीक की घटना के बाद 21 जून को NEET-UG 2026 की परीक्षा दोबारा कराने की घोषणा की है।

याचिका में कहा गया है कि पेपर लीक के आरोपों की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी है। लेकिन कुछ व्यक्तियों और सीमित जगहों में सामने आई कथित अनियमितताओं के आधार पर पूरे देश के लगभग 22 लाख अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देने के लिए बाध्य करना संविधान सम्मत नहीं माना जा सकता।

क्या है पूरा मामला?

NEET-UG देश में एमबीबीएस, बीडीएस और अन्य स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाने वाली सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षा है। इस साल परीक्षा के बाद कथित पेपर लीक और संगठित परीक्षा अनियमितताओं के आरोप सामने आए। मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई जिसने विभिन्न राज्यों में कार्रवाई करते हुए कई लोगों को गिरफ्तार किया।

जांच एजेंसी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे और अहिल्यानगर सहित अलग-अलग स्थानों पर कार्रवाई की गई। जांच में ऐसे लोगों की भूमिका सामने आने का दावा किया गया जो परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े थे और जिन्हें प्रश्नपत्रों तक पहुंच प्राप्त थी। आरोप है कि कुछ व्यक्तियों ने कथित तौर पर चुनिंदा अभ्यर्थियों को परीक्षा से पहले प्रश्न और उत्तर उपलब्ध कराए।

इसके बाद NTA ने पूरे देश में NEET-UG 2026 को दोबारा आयोजित करने का फैसला लिया और 21 जून को पुनर्परीक्षा की तारीख घोषित कर दी।

याचिका में क्या कहा गया है?

याचिकाकर्ता डॉ. मंगला कोहली ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा है कि उपलब्ध जांच सामग्री यह नहीं दिखाती कि देशभर में आयोजित पूरी परीक्षा की पवित्रता और विश्वसनीयता समाप्त हो गई थी। याचिका के अनुसार जांच अब तक कुछ विशिष्ट व्यक्तियों, कुछ परीक्षा केंद्रों और कुछ संगठित नेटवर्क तक सीमित दिखाई देती है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि अगर कथित अनियमितताएं कुछ क्षेत्रों या कुछ उम्मीदवारों तक सीमित थीं तो कार्रवाई भी उसी दायरे में केंद्रित होनी चाहिए थी। लेकिन पूरे देश में परीक्षा रद्द कर पुनर्परीक्षा कराने का फैसला लाखों छात्रों को प्रभावित करने वाला व्यापक कदम है जिसकी संवैधानिक वैधता की जांच आवश्यक है।

याचिका में कहा गया है कि पुनर्परीक्षा का निर्णय लेने से पहले कथित रूप से प्रभावित उम्मीदवारों, संदिग्ध परीक्षा केंद्रों और संभावित लाभार्थियों की पहचान करने का प्रयास किया जाना चाहिए था। ऐसा किए बिना पूरे देश के छात्रों पर पुनर्परीक्षा थोपना मनमाना और असंगत कदम है।

22 लाख छात्रों पर असर का तर्क

याचिका में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया है कि NEET जैसी परीक्षा के लिए छात्र कई सालों तक तैयारी करते हैं। परीक्षा खत्म होने के बाद वे परिणाम, काउंसलिंग और प्रवेश प्रक्रिया की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसे में पुनर्परीक्षा की घोषणा उनके मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक योजनाओं और आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि लाखों ऐसे अभ्यर्थी हैं जिनका कथित पेपर लीक या परीक्षा अनियमितताओं से कोई संबंध नहीं है। फिर भी उन्हें दोबारा परीक्षा प्रक्रिया से गुजरने के लिए बाध्य किया जा रहा है। याचिका के अनुसार प्रशासनिक चूक और सुरक्षा विफलताओं का बोझ निर्दोष छात्रों पर नहीं डाला जा सकता।

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि इस प्रकार के फैसलों को न्यायिक परीक्षण के बिना स्वीकार कर लिया गया तो भविष्य में भी परीक्षा संचालन में हुई किसी भी चूक का परिणाम लाखों छात्रों के लिए सामूहिक दंड के रूप में सामने आ सकता है।

NTA की कार्यप्रणाली पर सवाल

याचिका का एक महत्वपूर्ण पहलू NTA की परीक्षा संचालन व्यवस्था पर उठाए गए सवाल हैं। याचिकाकर्ता ने कहा है कि NEET परीक्षा से जुड़े विवाद पहली बार सामने नहीं आए हैं। पिछले वर्षों में भी पेपर लीक, परीक्षा केंद्रों पर कथित अनियमितताओं और परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े विवादों ने न्यायालयों का ध्यान खींचा था।

याचिका में दावा किया गया है कि बार-बार सामने आने वाली ऐसी घटनाएं परीक्षा संचालन प्रणाली में मौजूद संरचनात्मक कमजोरियों की ओर संकेत करती हैं। इसमें कहा गया है कि अगर जांच में ऐसे लोगों की भूमिका सामने आती है जिन्हें प्रश्नपत्रों तक आधिकारिक पहुंच प्राप्त थी तो यह केवल बाहरी आपराधिक गतिविधि का मामला नहीं रह जाता बल्कि परीक्षा तंत्र के भीतर की कमजोरियों को भी उजागर करता है।

याचिकाकर्ता के अनुसार लगातार सामने आ रही घटनाओं ने छात्रों, अभिभावकों और समाज के बीच परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। इसलिए केवल दोषियों की गिरफ्तारी या पुनर्परीक्षा कराना पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता।

डिजिटल परीक्षा प्रणाली लागू करने की मांग

याचिका में सुप्रीम Court से भविष्य की राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के लिए टेक्नोलॉजी बेस्ड सिक्यॉरिटी सिस्टम विकसित करने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। इसमें एन्क्रिप्टेड डिजिटल प्रश्नपत्र वितरण प्रणाली, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित निगरानी और कंप्यूटर आधारित परीक्षा व्यवस्था को अपनाने की बात कही गई है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान कागज आधारित परीक्षा प्रणाली में प्रश्नपत्रों के मुद्रण, परिवहन और वितरण के दौरान कई स्तरों पर सुरक्षा जोखिम बने रहते हैं। डिजिटल और सुरक्षित तकनीकी ढांचा इन जोखिमों को काफी हद तक कम कर सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रीय महत्व की परीक्षाओं में तकनीकी सुधार केवल सुविधा का विषय नहीं बल्कि परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की आवश्यकता बन चुके हैं।

स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग

याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को निर्देश देकर NTA की कार्यप्रणाली की व्यापक समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग भी की है। समिति को परीक्षा सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही, प्रश्नपत्र गोपनीयता, निगरानी व्यवस्था और संस्थागत सुधारों से जुड़े मुद्दों की जांच करने का सुझाव दिया गया है।

इसके अतिरिक्त जांच में चिन्हित संदिग्ध परीक्षा केंद्रों, परीक्षा कर्मियों और कथित नेटवर्क को भविष्य की परीक्षा प्रक्रियाओं से अलग रखने के लिए भी अदालत से निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

कौन हैं डॉ. मंगला कोहली?

याचिकाकर्ता डॉ. मंगला कोहली चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य प्रशासन के क्षेत्र की वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं। उनकी प्रोफाइल के अनुसार उन्होंने चार दशक से अधिक समय तक चिकित्सा शिक्षा, नीति निर्माण और प्रशासनिक सेवाओं में कार्य किया है। वह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत महानिदेशालय स्वास्थ्य सेवाएं (DGHS) में सहायक महानिदेशक (मेडिकल एजुकेशन) रह चुकी हैं।

डॉ. कोहली विभिन्न राष्ट्रीय समितियों में सदस्य सचिव और नीति निर्धारण से जुड़ी भूमिकाएं निभा चुकी हैं। उनके प्रोफाइल में यह भी जिक्र है कि देश में NEET परीक्षा के क्रियान्वयन और उसके प्रारंभिक ढांचे के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्तमान में वह आगरा स्थित एफएच मेडिकल कॉलेज में डीन (इंटरनेशनल स्टडीज एंड अफेयर्स) के रूप में कार्यरत हैं। चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

अंतरिम राहत में क्या मांग?

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत देते हुए 21 जून को प्रस्तावित NEET-UG 2026 पुनर्परीक्षा पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है। साथ ही अदालत से यह भी कहा गया है कि मामले के अंतिम निपटारे तक NTA को पुनर्परीक्षा से जुड़ी आगे की प्रशासनिक और परीक्षा संबंधी कार्रवाई करने से रोका जाए।

अब इस मामले पर सभी की निगाहें 17 जून की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट याचिका पर विचार करते हुए कोई अंतरिम आदेश जारी करता है तो इसका सीधा असर 21 जून को प्रस्तावित पुनर्परीक्षा और उससे जुड़े आगे के कार्यक्रम पर पड़ सकता है।