झारखंड हाई कोर्ट ने चार वर्षीय बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा उसकी मां को सौंप दी है। अदालत का मानना ​​है कि बच्ची के कल्याण और उसे मां के स्नेह और प्यार की जरूरत को देखते हुए मुख्य अभिरक्षा कार्यवाही लंबित रहने तक बच्ची की कस्टडी मां के पास ही होनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि बच्ची का जन्म आईवीएफ के माध्यम से हुआ है और मां ने इससे जुड़े दर्द और त्याग को सहन किया है।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और संजय प्रसाद 7 सितंबर को फैमिली कोर्ट के 27 नवंबर, 2025 के उस आदेश के खिलाफ मां की अपील की सुनवाई कर रहे थे। फैमिली कोर्ट ने बेटी की अंतरिम कस्टडी (Interim Custody) के लिए मां की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

अदालत ने कहा, “इतनी कम उम्र में बच्ची को मां के स्नेह और प्यार की सख्त जरूरत है और वह समझदारी से निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। यह सर्वविदित तथ्य है कि बच्ची का जन्म आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) के माध्यम से हुआ है और याचिकाकर्ता/अपीलकर्ता (मां) ने इससे जुड़े दर्द और त्याग को सहन किया है।”

हालांकि, पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि वह केवल अंतरिम हिरासत (Interim Custody) के सवाल पर निर्णय ले रही है और उसकी टिप्पणियां स्थायी हिरासत पर फैमिली कोर्ट के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी।

पांच साल से कम उम्र, कल्याण सर्वोपरि

जब हाई कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई की, तब बच्ची की उम्र करीब 4 साल 6 महीने थी। बेंच ने कहा कि उसकी उम्र महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उसकी तत्काल जरूरतों और अपनी पसंद को समझदारी से व्यक्त करने की उसकी क्षमता का आकलन किया जा सकता है। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चे की भलाई सबसे अहम होनी चाहिए। माता-पिता दोनों के अपने-अपने दावों से ज्यादा महत्व बच्चे के हित का है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अभिरक्षा संबंधी मामलों का निर्णय केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि बच्ची को आराम, संतुष्टि, स्वास्थ्य, शिक्षा, बौद्धिक विकास, परिवेश और नैतिक एवं सामाजिक कल्याण उन कारकों में शामिल हैं, जिन पर विचार किया जाना चाहिए।

पीठ ने यह भी कहा कि बच्चे का कल्याण केवल आर्थिक समृद्धि या भावनात्मक चिंता से निर्धारित नहीं होता, बल्कि बच्चे की संपूर्ण भलाई सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रासंगिक कारकों को संतुलित करके निर्धारित किया जाता है। फैसले में यह नहीं कहा गया कि आईवीएफ का मामला अपने आप में हिरासत के मुद्दे को निर्धारित करता है, बल्कि विभिन्न कारकों को ध्यान में रखते हुए इसका उल्लेख किया गया।

फैमिली कोर्ट का दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण

हाई कोर्ट की मुख्य चिंता यह थी कि फैमिली कोर्ट ने मां की ओर से बच्चे की अंतरिम कस्टडी के लिए दाखिल की गई अर्जी पर सही तरीके से फैसला किया था या नहीं। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 12 के तहत दायर इस अर्जी पर उचित तरीके से सुनवाई नहीं की।

धारा 12 के तहत अदालत को बच्चे की अंतरिम कस्टडी से जुड़े आदेश देने का अधिकार है। लेकिन फैमिली कोर्ट ने अंतरिम कस्टडी के मुद्दे पर सीधे फैसला करने के बजाय इस बात पर ज्यादा जोर दिया कि बच्चे को माता-पिता दोनों के प्यार और स्नेह की जरूरत है। इसी आधार पर उसने मुख्य रूप से पिता के लिए बच्चे से मिलने यानी विजिटेशन की व्यवस्था की।

हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का यह तरीका गलत था। कोर्ट ने माना कि मां को बच्चे की अंतरिम कस्टडी देने से इनकार करने वाला फैमिली कोर्ट का आदेश “विकृत” था और इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता। इसलिए हाई कोर्ट ने नवंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया।

मां को अंतरिम कस्टडी, पिता को मिलने की दी इजाजत

मां को बच्चे की अंतरिम कस्टडी देते हुए हाई कोर्ट ने पिता को बच्चे से मिलने से नहीं रोका। कोर्ट ने कहा कि पिता हर सप्ताहांत सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्ची से मुलाकात कर सकते हैं। मुलाकात दोनों पक्षों की सहमति से तय जगह पर या फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित स्थान पर हो सकती है।

न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि मुलाक़ात की व्यवस्था से बच्ची की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। फैमिली कोर्ट को परिस्थितियों के अनुसार मुलाकात की शर्तों को विनियमित करने, संशोधित करने या बदलने की स्वतंत्रता दी गई, जिसमें बच्ची के कल्याण को सर्वोपरि माना जाएगा।

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए कि बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा एक सप्ताह के भीतर मां को सौंप दी जाए। न्यायालय ने फैमिली कोर्ट को यह भी निर्देश दिया कि वह लंबित मुख्य अभिरक्षा कार्यवाही का शीघ्रता से और अनावश्यक स्थगन के बिना निपटारा करे।

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