बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और NALSAR यूनिवर्सिटी के बीच विवाद थमता नहीं दिख रहा है। बीसीआई द्वारा 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर लगी रोक वापस लेने के बावजूद NALSAR के 440 पूर्व छात्रों ने बीसीआई के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को एक खुला पत्र लिखकर विरोध जताया है।
पत्र में पूर्व छात्रों ने लिखा, “हम छात्रों, शिक्षकों और भारत के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से जुड़े मुद्दे पर आपके रवैये की कड़ी निंदा करते हैं। पूर्व छात्रों ने आरोप लगाया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया की कार्रवाई छात्रों और उनके मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनहीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की अनदेखी और युवा छात्रों तथा शिक्षित शिक्षकों के मामलों में मनमाने और दबंग तरीके से हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति को दर्शाती है।
पत्र में कहा गया कि बीसीआई का रवैया न केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि कैंपस में स्वतंत्र विचार और संवाद के माहौल को भी प्रभावित करता है।
पूर्व छात्रों ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को ऐसे पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि BCI के पहले पत्र की भाषा छात्रों और शिक्षकों पर दबाव बनाने वाली और धमकीपूर्ण थी।
पत्र में कहा गया कि इस तरह की भाषा विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास करती है और छात्रों व शिक्षकों को नियंत्रित करने की मानसिकता को दर्शाती है। पूर्व छात्रों के अनुसार, ऐसे कदमों से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी दबाव पड़ता है और कैंपस में स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक माहौल प्रभावित होता है।
यह पूरा विवाद NALSAR के 1,400 में से लगभग 450 छात्रों द्वारा शुरू किए गए उस अभियान से पैदा हुआ है, जिसमें दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को बुलाने का विरोध किया गया था।
गुरुवार को बीसीआई ने राज्य परिषदों को निर्देश दिया कि वे अगले आदेश तक 2026 के नालसार स्नातक को अधिवक्ता के रूप में नामांकित न करें। लेकिन आलोचना बढ़ने पर बीसीआई ने अपना यह आदेश वापस ले लिया।
पूर्व छात्रों के पत्र में यह भी कहा गया था कि यह मामला NALSAR का आंतरिक मामला था और कानूनी पेशे तथा विधि शिक्षा के मानकों को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार एक वैधानिक निकाय के लिए छात्रों और संकाय के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई करने का यह कोई औचित्य नहीं था। पत्र में कहा गया है कि कैंपस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित मामले विश्वविद्यालय के आंतरिक मामले हैं और बीसीआई के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
छात्रों ने कहा कि पहले पत्र की भाषा न केवल आपत्तिजनक थी, बल्कि यह छात्रों और शिक्षकों पर गुटबाजी, गंदी राजनीति, घटिया राजनीति और छात्रों को उकसाने एवं गुमराह करने का आरोप लगाकर उन्हें बदनाम करती है। इस तरह के बेबुनियाद बयान कानूनी पेशे के प्रति दायित्वों से ग्रस्त एक वैधानिक निकाय के लिए अशोभनीय हैं।
पत्र में आगे कहा गया कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम से ही स्पष्ट है कि विभिन्न विचारधाराओं के वकीलों ने औपनिवेशिक प्रभुत्व का विरोध करने के लिए एकजुट होकर बोलने की स्वतंत्रता का प्रयोग किया। भारत में कानून के छात्र इसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं। वे अपने जीवन के उस पड़ाव पर हैं जहां उन्हें विचारों के साथ प्रयोग करना चाहिए। इस स्वतंत्रता को पोषित और संरक्षित किया जाना चाहिए, न कि उत्पीड़न के खतरों से बचाया जाना चाहिए।
मेरे और छात्रों के बीच संवाद- सीजेआई
इससे पहले दिन में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मामले पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया को फटकार लगाई थी। सीजेआई ने छात्रों के विरोध करने के अधिकार पर ज़ोर देते हुए कहा कि छात्रों ने मुझे पत्र लिखा है। यह छात्रों और मेरे बीच संवाद है। बीसीआई की कार्रवाई बिल्कुल अनावश्यक थी। पूरी तरह से अनुचित। बीसीआई का इससे कोई लेना-देना नहीं है। सीजेआई की यह टिप्पणियां उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गईं जिसमें अब वापस लिए गए निर्देश को चुनौती दी गई थी।
एबीवीपी ने की आलोचना
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी बीसीआई की कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि “प्रत्येक छात्र की व्यक्तिगत भूमिका स्थापित किए बिना, स्नातक होने वाले पूरे बैच को प्रभावित करने वाला एक व्यापक प्रतिबंध उन लोगों के शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है जिनका कथित घटना से कोई संबंध नहीं है।
इसमें कहा गया है कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय किए बिना पूरे बैच के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई न तो उचित है और न ही न्यायसंगत। नियामक संस्थानों को अपनी शक्तियों का प्रयोग करते समय उचित प्रक्रिया, निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए।
हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के बीच शुरू हुआ विवाद कुछ ही घंटों में देशभर में चर्चा का विषय बन गया। पहले BCI ने NALSAR के 2026 बैच के सभी छात्रों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक लगाने का आदेश जारी किया, फिर उसी दिन उसे वापस भी ले लिया। इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत आखिर कैसे हुई और अब मामला कहां पहुंचा है? आइए समझते हैं। पढ़ें पूरी खबर।
