Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू से भरण-पोषण की मांग करने वाले एक बुजुर्ग दंपति की याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी बाध्यकारी क्यों न प्रतीत हो, उसे कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है।
पिछले साल अगस्त में फैमिली कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद बुजुर्ग दंपत्ति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया। उनके वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता बूढ़ें हैं और पढ़े लिखे नहीं है। साथ ही वकील ने कहा कि वे उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल अपने बेटे पर निर्भर थे। उनके बेटे की शादी 2016 में हुई थी और 2021 में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी पत्नी भी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है।
दंपत्ति ने क्या तर्क दिए?
दंपति ने तर्क दिया कि उनकी बहू की अच्छी इनकम है और बेटे की मौत के बाद उसे नौकरी से जुड़े लाभ भी मिल चुके हैं। अदालत ने अपने आदेश में कहा, “बहू के अपने बूढ़े सास-ससुर का भरण-पोषण करने के नैतिक दायित्व पर जोर दिया गया, जिसे याचिकाकर्ताओं के अनुसार कानूनी दायित्व माना जाना चाहिए।”
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बहू के वकील ने क्या दलील दीं
बहू के वकील ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने इस मामले का फैसला कर लिया है और इसमें किसी दखल की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बुजुर्ग दंपत्ति ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत राहत मांगी है और यह भी कहा कि सास-ससुर इस कानून के दायरे में नहीं आते हैं। धारा 144 अदालतों को किसी व्यक्ति को आदेश जारी करने का अधिकार देती है, जिसमें उसे अपनी आश्रित पत्नी, बच्चे और माता-पिता को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया जाता है।
जस्टिस मदन पाल सिंह ने 4 फरवरी को अपने फैसले में कहा, “विधानमंडल ने अपनी बुद्धिमत्ता से सास-ससुर को उक्त प्रावधान के दायरे में शामिल नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, उक्त प्रावधान के तहत बहू पर सास-ससुर के प्रति भरण-पोषण का दायित्व डालना विधानमंडल की योजना नहीं है।”
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि बहू को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी मिली थी। अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए बुजुर्ग दंपति की याचिका खारिज करते हुए कहा, “नैतिक दायित्व की अवधारणा, चाहे वह कितनी भी बाध्यकारी क्यों न लगे, वैधानिक आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं की जा सकती। उक्त प्रावधान के तहत भरण-पोषण का दावा केवल उन व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है जो उसमें विशेष रूप से सूचीबद्ध श्रेणियों में आते हैं।”
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