दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादी भी बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए आपराधिक कानूनों को दरकिनार नहीं कर सकती। कोर्ट ने 16 साल की लड़की से शादी करने और उसे गर्भवती करने के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया।

जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि भारत में यौन संबंधों के लिए सहमति की कानूनी उम्र 18 साल है। शादी या व्यक्तिगत सहमति के आधार पर इस उम्र की सीमा को बदला नहीं जा सकता। अदालत ने 23 सितंबर को दिए अपने आदेश में कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध बताई गई शादी अपने आप पति को POCSO या भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत अपराध से छूट नहीं देती।

16 साल की लड़की से शादी, आठ महीने की गर्भावस्था में सामने आया मामला

यह मामला एक मुस्लिम दंपति से जुड़ा है। सितंबर 2008 में जन्मी लड़की ने दिसंबर 2024 में करीब 28 साल के एक व्यक्ति से शादी की थी। दोनों परिवारों की सहमति से हुई इस शादी को लेकर लड़की और उसके पति ने लगातार कहा कि उनका विवाह और शारीरिक संबंध दोनों की सहमति से हुए थे।

मई 2026 में लड़की करीब आठ महीने की गर्भवती होने पर इलाज के लिए सरकारी अस्पताल पहुंची। अस्पताल में उसकी उम्र की जांच की गई। स्कूल रिकॉर्ड से पता चला कि वह 18 साल से कम उम्र की है। इसके बाद अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को इसकी जानकारी दी।

पुलिस ने लड़की के पति के खिलाफ पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत FIR दर्ज कर ली। इसके कुछ समय बाद जून में गर्भस्थ शिशु की मौत हो गई और लड़की ने मृत बच्चे को जन्म दिया।

पति-पत्नी ने FIR रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया

इसके बाद दोनों ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और FIR रद्द करने की मांग की। उनका तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार यौवन प्राप्त कर चुका व्यक्ति शादी करने में सक्षम होता है। इसलिए दोनों के बीच सहमति से बने वैवाहिक संबंध को आपराधिक मामला नहीं माना जाना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अवनीश सिंह ने महेंद्र विक्रम सिंह और सूरज शर्मा के साथ दलीलें पेश कीं। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 और मुल्ला की ‘प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मदन लॉ’ का हवाला दिया। दलील दी गई कि यौवन प्राप्त कर चुका और स्वस्थ मस्तिष्क वाला मुस्लिम व्यक्ति शादी करने में सक्षम होता है तथा बिना किसी अन्य प्रमाण के 15 साल की उम्र में यौवन प्राप्त होना माना जा सकता है।

‘सहमति POCSO के तहत अपराध खत्म नहीं करती’

दिल्ली हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पर्सनल लॉ यह तय कर सकता है कि शादी हुई है या नहीं और उससे जुड़े नागरिक अधिकार क्या होंगे, लेकिन अगर संसद के बनाए आपराधिक कानून में कोई छूट नहीं है, तो पर्सनल लॉ के आधार पर उससे बचा नहीं जा सकता।

पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून में 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को ‘बच्चा’ माना गया है। बच्चे के साथ ‘पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ को अपराध बनाया गया है और बच्चे की सहमति इस कृत्य को अपराध की श्रेणी से बाहर नहीं करती।

अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भी यही कानूनी स्थिति दिखाई देती है। BNS की धारा 63 के अनुसार 18 साल से कम उम्र की महिला के साथ यौन संबंध बनाना उसकी सहमति हो या न हो, बलात्कार की श्रेणी में आता है।

‘संविधान पसंद की आजादी देता है, POCSO से छूट नहीं’

अदालत ने माना कि जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता व्यक्तिगत आजादी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संविधान धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता भी देता है। लेकिन कोर्ट ने यह बात भी साफ किया कि इनमें से कोई भी अधिकार बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए सामान्य आपराधिक कानून से छूट नहीं देता।

अदालत के अनुसार, संविधान व्यक्ति को अपनी पसंद का अधिकार देता है, लेकिन इससे POCSO या BNS के प्रावधानों से अलग कोई कानूनी रास्ता नहीं बनता।

लड़की ने कहा- उसने अपनी पसंद से की शादी

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि लड़की का कहना है कि उसने अपनी पसंद से शादी की थी और वह अब भी अपने पति के साथ है। उसने पति के खिलाफ किसी तरह की शिकायत या खुद को पीड़ित मानने की बात नहीं कही।

कोर्ट ने कहा कि लड़की की राय को गंभीरता और सम्मान के साथ सुना जाना चाहिए। हालांकि, मुख्य सवाल यह है कि जब लड़की 18 साल से कम उम्र की थी, तब दी गई उसकी सहमति और उससे पहले हुआ निकाह क्या POCSO और BNS के प्रावधानों को लागू होने से रोक सकता है। अदालत ने इसका जवाब ‘नहीं’ में दिया।

बच्चे की मौत पर कोर्ट ने जताई संवेदना

कोर्ट ने दंपति की स्थिति के प्रति सहानुभूति भी जताई और कहा कि बच्चे को खोने का दुख कम नहीं आंका जा सकता। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस दुख के प्रति सहानुभूति के आधार पर किसी संज्ञेय अपराध की FIR को अवैध नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि यह मामला व्यक्तिगत पसंद और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून के बीच महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाता है। शादी के समय लड़की की उम्र 16 साल से थोड़ी अधिक थी। 18 साल से कम उम्र होने के कारण कानून की नजर में वह नाबालिग थी। इसलिए इस मामले में POCSO के प्रावधान लागू होते हैं, जिनका मकसद बच्चों को यौन शोषण और बाल विवाह से होने वाले नुकसान से बचाना है।

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