देशभर में मौजूदा और पूर्व सांसदों व विधायकों के खिलाफ सुनवाई के लिए कुल 4,192 मामले लंबित हैं। इनमें से 519 मामले 10 साल से ज्यादा समय से लबित हैं। यह जानकारी सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई की मांग वाली जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की गई रिपोर्ट में दी गई है। इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने दाखिल किया है।
इसके अलावा, 700 मामले जांच के स्तर पर लंबित हैं। इनमें से 360 मामले तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं और अब तक उनमें चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है।
ये आंकड़े हंसारिया की 22वीं एमिकस रिपोर्ट का हिस्सा हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 4192 लंबित मामलों का आंकड़ा विभिन्न हाई कोर्ट से मिली जानकारी और उनकी वेबसाइटों पर उपलब्ध डेटा के आधार पर तैयार किया गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोई रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई। इसलिए उसके 1171 लंबित मामलों का आंकड़ा फरवरी 2024 तक उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी से लिया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट की वेबसाइटों पर उपलब्ध आंकड़ों को मिलाकर कुल 4442 मामले लंबित दिखाई देते हैं।
किस राज्य में कितने लंबित मामले
रिपोर्ट के अनुसार, 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले सुनवाई के लिए लंबित हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ हैं जिन पर 89 मामले लंबित हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी (29), कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू (दोनों पर 19-19 मामले) और केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन (18) का नंबर है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 4192 लंबित मामलों में से 754 मामले 5 से 10 साल पुराने, 562 मामले 3 से 5 साल पुराने और 1095 मामले 3 साल से कम समय से लंबित हैं।
जिन राज्यों/हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा मामले लंबित होने की सूचना मिली है उनमें उत्तर प्रदेश (1,171), केरल (543), बिहार (373), महाराष्ट्र (364) और ओडिशा (330) शामिल हैं। इन आंकड़ों की कट-ऑफ तारीखें अलग-अलग हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के लिए लंबित मामलों की संख्या में उतार-चढ़ाव जरूर आया है। लेकिन 2018 से यह आंकड़ा लगातार 4000 से ऊपर बना हुआ है। दिसंबर 2018 में लंबित मामलों की संख्या 4075 थी जो नवंबर 2022 में बढ़कर 5140 हो गई। इसके बाद जुलाई 2026 में यह संख्या घटकर 4192 रह गई।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया था सभी हाई कोर्ट को निर्देश
2017 में सुप्रीम कोर्ट ने विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के लिए 10 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 12 विशेष अदालतें स्थापित करने का आदेश दिया था। दिसंबर 2018 में कोर्ट ने निर्देश दिया कि हर जिले में एक नामित सेशन कोर्ट और एक नामित मजिस्ट्रेट कोर्ट की पहचान की जाए ताकि इन मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जा सके।
नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया था कि वे ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई और निपटारे की निगरानी के लिए स्वतः संज्ञान (suo motu) मामले दर्ज करें। कोर्ट ने विशेष पीठों को भी मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का अधिकार दिया था।
फरवरी 2025 में इस मामले को तीन जजों की बेंच के पास भेज दिया गया था। ऐसा पिछली एमिकस क्यूरी रिपोर्ट में यह सामने आने के बाद किया गया कि अधिकतर हाई कोर्ट की ओर से मामलों की प्रभावी निगरानी नहीं की जा रही है। इस मामले पर 18 अगस्त को तीन जजों की पीठ के समक्ष सुनवाई होनी है।
हंसारिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद लंबित मामलों की संख्या लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है। उन्होंने देरी के लिए कई कारणों को जिम्मेदार बताया। इनमें नामित अदालतों पर नियमित न्यायिक काम का अतिरिक्त बोझ, बार-बार सुनवाई टलना, आरोपियों का अदालत में उपस्थित न होना, गवाहों को पेश करने में देरी और हाई कोर्ट की ओर से पर्याप्त निगरानी का अभाव शामिल हैं।
एमिकस क्यूरी ने क्या सिफारिशें की
एमिकस क्यूरी ने सिफारिश की है कि विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए नामित अदालतें तब तक विशेष रूप से इन्हीं मामलों की सुनवाई करें, जब तक उनका लंबित बैकलॉग खत्म नहीं हो जाता। इसके अलावा, 3 साल से ज्यादा समय से लंबित मामलों की रोजाना सुनवाई की जाए। अगर कोई आरोपी सांसद या विधायक लगातार दो तारीखों पर अदालत में पेश नहीं होता है तो अदालत उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी करे।
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि गवाहों को अदालत में पेश कराने के लिए एक नोडल अभियोजन अधिकारी नियुक्त किया जाए। इसके साथ ही हाई कोर्ट की वेबसाइटों पर मामलों से जुड़े आंकड़ों और आदेश पत्रों को रियल-टाइम में अपलोड करना अनिवार्य किया जाए।
हंसारिया ने यह भी सिफारिश की है कि चार्जशीट/आरोप तय होने के एक साल के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी की जाए। इसके अलावा, 3 साल से ज्यादा समय से लंबित मामलों की हाई कोर्ट हर महीने निगरानी करें और जिन मामलों में असामान्य देरी हो रही है, उनकी ‘माइक्रो-मॉनिटरिंग’ यानी व्यक्तिगत स्तर पर गहन निगरानी की जाए।
‘भीड़ में फंसने पर कांस्टेबल ने AK-47 से हवा में चलाई थीं 4 गोलियां’, सुप्रीम कोर्ट में बिहार पुलिस
बिहार में 25 जुलाई को बंद और ‘जंतर-मंतर’ विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को लेकर बिहार पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। पुलिस ने अदालत को बताया कि सिवान में भीड़ में फंसने के बाद जिला इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) के एक कांस्टेबल ने अपनी AK-47 राइफल से हवा में चार राउंड फायर किए थे। हालांकि इस फायरिंग में कोई घायल नहीं हुआ।
