Legal News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 14 साल जेल में बिताने वाले दो लोगों को राहत दी है और एक हत्या के मामले में उनकी दोषसिद्धि को पलट दिया है। हाईकोर्ट की इस फैसले की वजह निचली अदालत का एक फैसला था, जो कि उसने एक अन्य मामले की फॉरेंसिंक रिपोर्ट पर भरोसा किया था।

अभियोजन पक्ष के मामले को गंभीर खामियों से भरा बताते हुए मध्य प्रदेश की अदालत ने कहा कि एफआईआर एक अज्ञात पुलिस अधिकारी द्वारा लिखी गई थी, जिसका बयान कभी दर्ज नहीं किया गया था।

हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल और अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने हाल ही में दमोह स्थित विशेष सत्र न्यायालय के 29 जून 2012 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें तुलसीराम राजपाल और हरप्रसाद को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302, 302/34 और 450 के तहत दोषी ठहराया गया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक 25 अगस्त 2009 की रात को प्यारेलाल गडरिया ने शिकायत दर्ज कराई कि आरोपी उनके घर में घुस आए, उनके परिवार को अपशब्द कहे और उन पर हमला किया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, तुलसीराम ने प्यारेलाल के पेट में चाकू से वार किया, जबकि हरप्रसाद और एक अन्य आरोपी ने उन्हें पकड़ रखा था। बताया जाता है कि एफआईआर दर्ज कराने के बाद प्यारेलाल की मौत हो गई। अभियोजन पक्ष ने मुकदमे के दौरान 15 गवाहों से पूछताछ की।

फॉरेंसिंक रिपोर्ट का लेना-देना नहीं

हाई कोर्ट ने पाया कि चिह्नित फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट का वर्तमान मामले से कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि यह एक अन्य अभियोजन से संबंधित थी, जिसमें पूरी तरह से अलग आरोपी, हथियार और घायल व्यक्ति शामिल थे। इसके बावजूद रिपोर्ट को प्रदर्शित किया गया, धारा 313 सीआरपीसी के तहत उनकी पूछताछ के दौरान आरोपियों के सामने पेश किया गया और दोषसिद्धि दर्ज करते समय ट्रायल कोर्ट द्वारा इस पर भरोसा किया गया।

हाई कोर्ट की बेंच ने कहा, “हमें इस बात पर बेहद हैरानी है कि निचली अदालत से यह लापरवाही कैसे हुई,” पीठ ने टिप्पणी की। “यह आश्चर्यजनक है कि अंतिम बहस के दौरान या मुकदमे के किसी भी चरण में किसी भी पक्ष ने इस मुद्दे पर आपत्ति नहीं जताई; इसलिए, हम पाते हैं कि निचली अदालत का फैसला सावधानीपूर्वक नहीं लिखा गया था और केवल इसी आधार पर फैसले को रद्द किया जा सकता है।”

FIR में रिपोर्ट लिखने वाले का बयान अहम

बेंच ने गौर किया कि जांच अधिकारी अशोक कुमार नानामा ने स्वीकार किया कि एफआईआर उनकी अपनी लिखावट में नहीं थी और मौका दिए जाने के बावजूद वे उस पुलिस अधिकारी की पहचान करने में विफल रहे जिसने वास्तव में इसे लिखा था। इसे गंभीर चूक बताते हुए अदालत ने कहा, “रिपोर्ट लिखने वाले व्यक्ति का बयान ट्रायल कोर्ट के समक्ष दर्ज किया जाना चाहिए था, लेकिन असामान्य रूप से किसी अन्य पुलिस कर्मचारी ने एफआईआर लिखी… और केवल पीडब्ल्यू-14 के हस्ताक्षर थे।”

हाई कोर्ट ने कहा कि उक्त दस्तावेज़ दाखिल न करना बचाव पक्ष के इस तर्क को विश्वसनीयता प्रदान करता है कि प्यारेलाल ने एफआईआर दर्ज नहीं कराई थी और उनकी पहले ही मृत्यु हो चुकी थी और शायद यह उनके परिवार के किसी सदस्य द्वारा दर्ज कराई गई थी, लेकिन प्यारेलाल के अंगूठे का निशान किसी अज्ञात पुलिस अधिकारी द्वारा लिया गया था। पीठ ने डॉक्टर की गवाही पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि प्यारेलाल को “मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया था।

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