Uttarakhand High Court: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने उस न्यायिक अधिकारी को फिर से नौकरी पर बहाल करने का आदेश दिया है, जिसे वर्ष 2020 में सेवा से हटा दिया गया था।

यह मामला सिविल जज (वरिष्ठ श्रेणी) दीपाली शर्मा से जुड़ा है। उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपने घर पर 17 वर्षीय लड़की को घरेलू सहायिका के रूप में रखा और उसके साथ शारीरिक व मानसिक दुर्व्यवहार किया। इसी शिकायत के आधार पर उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि दीपाली शर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत नहीं हैं। पीठ के अनुसार, यह मामला सिर्फ ‘सबूतों की कमी’ का नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है जैसे बिना किसी ठोस आधार के पूरा मामला खड़ा कर दिया गया हो।

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि इस पूरे प्रकरण को ‘तिल का ताड़ बनाना’ भी कहा जा सकता है। इन सभी कारणों से हाई कोर्ट ने दीपाली शर्मा को राहत देते हुए उनकी बहाली का आदेश दिया।

कोर्ट ने इस मामले की जांच करने वाले न्यायिक अधिकारियों की कड़ी आलोचना की। अदालत ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए उन्होंने जिस तरह की प्रक्रिया अपनाई, वह हैरान करने वाली है। पीठ ने यह भी कहा कि यह बात और ज्यादा चिंता पैदा करती है, क्योंकि इस पूरे मामले में शामिल सभी लोग प्रशिक्षित और अनुभवी न्यायिक अधिकारी थे, जिनसे कानून और प्रक्रिया की सही समझ की उम्मीद की जाती है।

अदालत ने खास तौर पर पीड़िता की मेडिकल जांच में हुई गंभीर कमियों की ओर ध्यान दिलाया। पीठ ने कहा कि किसी योग्य डॉक्टर से मेडिकल सर्टिफिकेट तक नहीं बनवाया गया, जो बेहद चौंकाने वाला है। इसके अलावा, न्यायालय ने उच्च न्यायालय प्रशासन की विफलताओं को भी रेखांकित किया। उस समय हाई कोर्ट का नेतृत्व तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.एम. जोसेफ कर रहे थे, जिन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आई शिकायत और उससे जुड़े सबूत सीधे मुख्य न्यायाधीश के सामने रखे जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

न्यायालय ने आगे कहा कि इस मामले में संचार के लिए बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का इस्तेमाल किया गया था। यहां तक कि निलंबन आदेश जारी करने से पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की सहमति भी इसी तरीके से ली गई थी। ऐसे में अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका ठोस प्रमाण पेश किया जाना जरूरी था, खासकर तब जब याचिकाकर्ता ने मुख्य न्यायाधीश द्वारा जारी आदेशों की असलियत पर सवाल उठाया था।

अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि उच्च न्यायालय प्रशासन शर्मा को वे दस्तावेज क्यों नहीं दे पाया, जिन पर जांच अधिकारी ने भरोसा किया था। अदालत के अनुसार, किसी भी निष्पक्ष जांच के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि आरोपी अधिकारी को सभी संबंधित कागजात उपलब्ध कराए जाएं।

इसके अलावा, न्यायालय इस बात से भी बेहद हैरान हुआ कि एक साधारण से आरोप, यानी किसी नाबालिग को घरेलू नौकर के रूप में रखने पर 356 पन्नों की जांच रिपोर्ट तैयार की गई, जिसमें कुल 660 पैराग्राफ थे। अदालत ने कहा कि यही बात उसे चौंकाने वाली लगी और इसी वजह से उसने पूरे मामले की गहराई से जांच करने का फैसला किया।

अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि सिविल जज के घर पर छापा मारने के लिए भारी पुलिस बल और दो वीडियोग्राफरों को साथ ले जाया गया। न्यायालय ने कहा कि इतनी कड़ी तैयारी और सतर्कता आम तौर पर बहुत गंभीर मामलों में की जाती है।

पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर इतनी सावधानी बरती गई होती, तो शायद किसी बड़े अपराध या आतंकवाद से जुड़े मामलों में गिरफ्तारी की जा सकती थी। अदालत ने पूछताछ के तरीके पर भी सवाल उठाए और कहा कि यह समझना मुश्किल है कि इतनी ज़्यादा सख्ती की जरूरत क्यों पड़ी, क्या यह बेवजह था या किसी खास मकसद से किया गया।

न्यायालय ने यह भी कहा कि कथित पीड़ित नाबालिग बच्चे से घर के बाहर, खुले में पूछताछ की गई, जिससे यह शक पैदा होता है कि कहीं इसका उद्देश्य याचिकाकर्ता को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना तो नहीं था। अदालत ने यह भी नोट किया कि बच्चे के कपड़ों को लेकर कई बातें कही गईं, लेकिन इसके बावजूद पूरी कार्यवाही ठंड के मौसम में खुले में कराई गई। पीठ ने यह भी बताया कि लिखित रिकॉर्ड देखने से साफ पता चलता है कि यह पूरी पूछताछ काफी लंबे समय तक चली, जो अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।

अदालत ने कहा कि जिस तरह से पूरी कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग मीडिया में साझा की गई, उससे साफ लगता है कि इसका मकसद न्याय दिलाना नहीं था, बल्कि न्यायिक अधिकारी को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना था। फैसले में कहा गया कि एक ही झटके में याचिकाकर्ता को समाज में बदनामी का सामना करना पड़ा। पीठ ने टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारियों ने अपनी ताकत और अधिकार दिखाने की कोशिश में यह नहीं समझा कि इससे न्यायपालिका जैसी संस्था की साख को जनता के बीच कितना नुकसान पहुंचा है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला न्यायाधीश द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया और तरीके पर उसे गंभीर आपत्तियां हैं। हालांकि फिलहाल उनके खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू नहीं की जा रही है। पीठ ने कहा कि किसी महिला अधिकारी को कथित जांच के लिए भी उसके घर पर बुलाना, उसके पद और गरिमा का अपमान है।

न्यायालय के अनुसार, इस कार्रवाई से न सिर्फ संबंधित व्यक्ति का अपमान हुआ, बल्कि उसके पद का भी अपमान हुआ और इससे संस्थानों की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा। अदालत ने कहा कि इन सबके कारण याचिकाकर्ता को शुरुआती जांच पूरी होने से पहले ही दोषी मान लिया गया, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

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अदालत ने आदेश दिया कि दीपाली शर्मा को जिस दिन सेवा से बर्खास्त किया गया था, उसी तारीख से उन्हें लगातार सेवा में माना जाएगा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि उन्हें सभी संबंधित लाभ दिए जाएं, जिनमें उनसे जूनियर अधिकारियों से ऊपर वरिष्ठता का दर्जा भी शामिल है।

हालांकि, वेतन और अन्य आर्थिक लाभों को लेकर अदालत ने संतुलित रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि काफी लंबा समय बीत चुका है, इसलिए बिना काम किए पूरे 100 प्रतिशत वेतन और भत्तों का भुगतान करना राज्य के खजाने पर अनुचित बोझ होगा। इसी वजह से अदालत ने तय किया कि शर्मा को वेतन और अन्य मौद्रिक लाभों का केवल 50 प्रतिशत ही दिया जाएगा। उनका वेतन दोबारा तय (री-फिक्स) किया जाएगा। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि राज्य सरकार द्वारा शर्मा के खिलाफ शुरू किया गया आपराधिक मामला बाद में वापस ले लिया गया था, जो उनके पक्ष में एक अहम तथ्य है।

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