केंद्र सरकार ने मॉनसून सत्र के मद्देनजर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने वाले विधेयक का मंजूरी दे दी है। विधेयक में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रावधान है।

सरकार ने अपने एक बयान में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 को हरी झंडी दे दी है। इस विधेयक का उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) कानून 1956 संशोधन करना है, जिससे कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या में चार अतिरिक्त वृद्धि हो जाए।

कानून लागू होने के बाद कितनी हो जाएगी संख्या?

वर्तमान में यह कानून भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर अधिकतम 33 न्यायाधीशों का प्रावधान करता है, इस नए संशोधन विधेयक के बाद यह संख्या बढ़कर मुख्य न्यायाधीश को जोड़कर 38 हो जाएगी।

बयान में सरकार ने आगे कहा, “न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से सुप्रीम कोर्ट अधिक कुशलता और प्रभावी ढंग से काम कर पाएगा, जिससे तेजी से न्याय मिलेगा। न्यायाधीशों और सहायक कर्मचारियों की सैलरी और अन्य सुविधाओं पर होने वाला व्यय भारत सरकार की ओर से दिया जाएगा।”

अभी कितनी है न्यायाधीशों की संख्या?

सुप्रीम कोर्ट ने अभी 32 न्यायाधीश हैं, जिनमें से चार 2026 में ही रिटायर हो जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश राजेश बिंदल अप्रैल में रिटायर हो गए, न्यायाधीश जेके महेश्वरी और न्यायाधीश पंकज मिथल जून में रिटायर होंगे। जबकि न्यायाधीश करोल अगस्त में और न्यायाधीश सतीश शर्मा इसी साल के नवंबर माह में रिटायर होंगे।

अब अगर यह विधेयक दोनों सदनों से पास हो जाता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को इस साल कम से कम 9 सिफारिशें करनी होंगी। सीजेआई सूर्यकांत का कार्यकाल फरवरी 2027 तक है।

2019 में बढ़ाई गई थी संख्या

साल 2019 में पिछली बार सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई गई थी। उस दौरान सीजेआई को मिलाकर न्यायाधीशों की संख्या 30 से 34 की गई थी। मूलरूप से इस कानून में सीजेआई को छोड़कर अधिकतम 10 न्यायाधीशों को शामिल करने का प्रावधान था, जिसे 1960 में बढ़ाकर 13 और फिर 1977 में बढ़ाकर 17 कर दिया गया।

सरकार ने बयान में आगे कहा, “सुप्रीम कोर्ट की कार्यक्षमता को कैबिनेट द्वारा 1979 के अंत में 15 न्यायाधीशों (सीजेआई को छोड़कर) तक सीमित रखा गया। बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश के अनुरोध पर इस प्रतिबंध को हटा लिया गया।” इसके बाद इस संख्या को 1986, 2008 और 2019 में और बढ़ाया गया।

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सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को टीएमसी की उस याचिका पर सुनावई की, जिसमें ममता की पार्टी ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर रोक लगाने की मांग की है। जिसमें मतगणना पर्यवेक्षकों के तौर पर सिर्फ केंद्रीय कर्मचारी या PSU स्टाफ रखने की बात कही गई है। TMC ने इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने आपत्ति खारिज करते हुए कहा था कि काउंटिंग स्टाफ की नियुक्ति चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसमें कोई अवैधता नहीं है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें