इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के प्रावधानों का दुरुपयोग करने के लिए हैदराबाद के एक व्यक्ति पर 6.70 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। हाई कोर्ट ने कहा कि RTI आवेदन दाखिल करने वाला शख्स अनावश्यक आरोप लगाता है।
याचिकाकर्ता वेमुला वेंकट विनय बाबू उर्फ विनय वेमुला ने इस वर्ष 4 जून से 17 जुलाई के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट में 24 आरटीआई आवेदन दायर किए थे। जिनमें अदालत के कामकाज और प्रशासन से संबंधित जानकारी और रिकॉर्ड मांगे गए थे, जिनमें आंतरिक कार्यालय नोट, फाइल आवागमन रिकॉर्ड, अदालत में उपस्थिति रजिस्टर का विवरण शामिल था।
5 अगस्त को अपने आदेश में याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की सिंगल बेंच ने निर्देश दिया कि सभी 24 आरटीआई आवेदनों को उप रजिस्ट्रार (आरटीआई) कार्यालय के अभिलेखों में भेज दिया जाए।
हाई कोर्ट ने लगाया जुर्माना
पीठ ने प्रत्येक आवेदन पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया। जो कुल मिलाकर 1.20 लाख रुपये बनता है। इसने याचिकाकर्ता पर गलत तरीके से आरटीआई आवेदन दाखिल करने के लिए 50,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा, “याचिकाकर्ता जैसे व्यक्तियों को अदालती कार्यवाही और न्याय प्रशासन में बाधा डालने से रोकने के लिए, 5,00,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया जाता है।”
आदेश में कहा गया है कि याचिकाकर्ता को 5 अगस्त से चार सप्ताह के भीतर उच्च न्यायालय विधि सेवा समिति के बैंक खाते में कुल 6.70 लाख रुपये का भुगतान करना होगा। भुगतान में चूक होने पर रजिस्ट्रार जनरल उचित कार्रवाई करेंगे।
क्या है मामला?
लखनऊ में उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के आयुक्त के पास दायर अपने प्रारंभिक आरटीआई आवेदन में वेमुला ने गोरखपुर में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने वाली एक महिला और शिकायत की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी थी। सूचना भेज दी गई थी, लेकिन उन्होंने अपील दायर की, जिसे सूचना आयुक्त ने 2023 में खारिज कर दिया। उन्होंने 5 जनवरी, 2024 को उच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी।
यह याचिका शुरू में एक वकील के माध्यम से दायर की गई थी। मई 2025 में वेमुला ने अपने वकील को हटाकर स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में पेश होने का अनुरोध किया।
अदालत ने क्या कहा?
न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता की सूचना आयोग के समक्ष अपील इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि आवश्यक जानकारी पहले ही 11 जनवरी, 2023 की पंजीकृत डाक द्वारा प्रदान की जा चुकी थी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने रिट याचिका में सूचना प्राप्त करने से इनकार नहीं किया है और न ही उसने इसकी कोई प्रति रिकॉर्ड पर रखी है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित न होने और 2,000 किलोमीटर की यात्रा का हवाला देते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगने का संज्ञान लिया। इसके बजाय, याचिकाकर्ता ने “विरोध की औपचारिक लिखित घोषणा” विषय के साथ एक ईमेल भेजा। जिसमें उसने दावा किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग उसका मौलिक अधिकार है।
अदालत ने शीर्षक को न केवल अस्पष्ट बल्कि अपमानजनक भी पाया और कहा कि आभासी सुनवाई एक मौलिक अधिकार नहीं बल्कि अदालत के विवेक के अधीन एक सुविधा है।
जस्टिस शमशेरी ने याचिकाकर्ता के व्यवहार पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि हाल ही में न केवल सर्वोच्च न्यायालय में बल्कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां स्वयं उपस्थित याचिकाकर्ताओं ने अदालत की मर्यादा बनाए रखने में विफल रहे और अनुशासनहीन तरीके से व्यवहार किया। अदालत ने गौर किया कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने अदालतों की छवि खराब करने के लिए वीडियो रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किया था। इसमें आगे कहा गया है कि याचिकाकर्ता “अड़ियल” था और उसने रसद संबंधी कठिनाइयों का हवाला देते हुए अदालत के समक्ष पेश होने से “स्पष्ट रूप से इनकार” कर दिया था, जबकि वह पहले ही लगभग चार या पांच बार इलाहाबाद की यात्रा कर चुका था।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के 5 अगस्त के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है। हाई कोर्ट ने उनकी आंखों के इलाज के लिए विदेश यात्रा की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज कर दी थी। हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के संबंध में कथित रूप से भड़काऊ भाषण देने से जुड़े आपराधिक मामले में बनर्जी की गिरफ्तारी पर रोक लगाने की शर्त के रूप में उच्च न्यायालय द्वारा विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगाया गया था। पढ़ें पूरी खबर।
