Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स के एक कर्मचारी की विधवा को अतिरिक्त 10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। मोहन सिंह को भारत-चीन सीमा पर सड़क निर्माण के दौरान साथी श्रमिकों की जान बचाने के बाद मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने विधवा को उसके पति की मृत्यु की तारीख से असाधारण पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया।
क्या है पूरा मामला?
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट दिवंगत मोहन सिंह की विधवा कुलदीप कौर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। इसमें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जनवरी 2026 के फैसले को चुनौती दी गई थी। मोहन सिंह जीआरईएफ में ओवरसियर के रूप में कार्यरत थे और उन्हें अरुणाचल प्रदेश में हायलियांग-मेटंगलियांग-चागलोहागोम सड़क की फॉर्मेशन कटिंग के लिए कार्य प्रभारी के रूप में तैनात किया गया था। चीन-भारत सीमा के प्रबंधन के लिहाज से इस 57 किलोमीटर लंबी सड़क को राष्ट्रीय और रणनीतिक रूप से बहुत अहम बताया गया था।
10 जुलाई 2000 को एक खतरनाक और पथरीली जगह पर डोजर के काम की देखरेख करते समय, सिंह ने देखा कि पहाड़ी की चोटी से एक बड़ा पत्थर और मलबा निर्माण काम में इस्तेमाल हो रही मशीनों की ओर लुढ़कते हुए आ रहा था। उन्होंने तुरंत डोजर और कंप्रेसर ऑपरेटरों को आगाह किया और उन्हें सुरक्षित जगह पर जाने के लिए कहा।
2001 में मोहन सिंह को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया
इसके बाद, उन्होंने मशीनों को नुकसान से बचाने और उससे भी जरूरी, उन्हें चलाने वाले कर्मचारियों की जान बचाने के लिए मशीनों को उस जगह से हटाने में मदद की। ऐसा करते समय, वे उस बड़े पत्थर के रास्ते से हट नहीं पाए और उसकी चपेट में आकर लगभग 70 मीटर नीचे घाटी में जा गिरे। उनकी बहादुरी को देखते हुए सरकार ने 19 अक्टूबर, 2001 को सिंह को मरणोपरांत ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित किया।
शुरुआत में कुलदीप कौर को सामान्य पारिवारिक पेंशन मिल रही थी। दिसंबर 2005 में उन्होंने सीसीएस (असाधारण पेंशन) नियम, 1939 के तहत विशेष पारिवारिक पेंशन की मांग की। उनकी अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी गई कि उन्हें कामगार मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत पहले ही 1,84,170 मिल चुके थे और इसलिए वह उदार पेंशन लाभ की हकदार नहीं थीं। 2011 में उनकी एक और अर्जी भी खारिज कर दी गई।
कौर ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया
इसके बाद कौर ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया। एकल न्यायाधीश ने माना कि उनके पति की मृत्यु लागू पेंशन योजना की कैटेगरी ‘सी’ के अंतर्गत आती है और उन्हें असाधारण पेंशन प्रदान की, साथ ही उन्हें 6% ब्याज सहित मुआवजा राशि लौटाने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने बाद में इस वर्गीकरण को बरकरार रखा, लेकिन कौर की ओर से दिए गए वचन के आधार पर, बकाया राशि को याचिका दायर करने से पहले के तीन सालों तक सीमित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने की अहम टिप्पणी
जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट पहले ही हाई कोर्ट से सहमत हो चुका था कि सिंह का मामला सी कैटेगरी में आता है। हालांकि, कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या विधवा को मिलने वाली आर्थिक सहायता तीन साल तक ही सीमित होनी चाहिए थी।
न्यायालय ने कहा कि सिंह ने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया है और उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि परिवार या विधवा को आमतौर पर ऐसी राहत प्राप्त करने के लिए न्यायालय जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए और विधवा द्वारा न्यायालय तक पहुंचने में लगने वाला लंबा समय न्याय मिलने में बाधा नहीं बनना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, “हम भारत सरकार को निर्देश देते हैं कि वह आज से चार हफ्ते के अंदर यानी 5 अगस्त, 2026 तक अपीलकर्ता को 1000,000 रुपये की राशि जारी करे।”
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