हैदराबाद जिला उपभोक्ता आयोग ने एक बीमा कंपनी को 43 साल की महिला कारोबारी को 5.60 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। आयोग ने पाया कि कंपनी ने महिला के वाहन बीमा क्लेम को खारिज करने में सेवा में कमी की थी। महिला ने अपनी चार पहिया गाड़ी का बीमा कराया था, जो जुलाई 2021 में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। बीमा कंपनी ने दावा खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि वाहन दुर्घटना से पहले ही क्षतिग्रस्त हो गया था और उसकी स्थिति का खुलासा नहीं किया गया था।
आयोग के अध्यक्ष वक्कंती नरसिम्हा राव और सदस्य सुमा वाला ने महिला की शिकायत पर सुनवाई करते हुए पाया कि पहले से नुकसान होने, मालिकाना हक बदलने और जानकारी न देने के आरोप ठोस दस्तावेजी सबूतों से साबित नहीं हुए।
18 अगस्त के आदेश में कहा गया, “सर्वेयर ने एक्स B-2 के तहत अनुमानित नुकसान 6.21 लाख रुपये आंका था, लेकिन शिकायतकर्ता (महिला) पॉलिसी के तहत खारिज किए गए क्लेम के लिए 5 लाख रुपये की मांग कर रही है। सेवा में कमी और दूसरी पार्टी (बीमा कंपनी) द्वारा अनुचित और प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथाओं को अपनाने के कारण हम उन्हें उतनी ही राशि का क्लेम देने तक सीमित हैं।”
महिला ने दावा किया कि उसने एक वाहन खरीदा था और उसका बीमा उसी बीमा कंपनी से कराया था, जिसकी पॉलिसी 30 जनवरी 2021 से 29 जनवरी 2022 तक वैध थी। उसने बताया कि 21 जुलाई 2021 को रात करीब 10 बजे नरसिंगी में उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया, जिससे गाड़ी का अगला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया।
महिला ने इंश्योरेंस कंपनी को हादसे के बारे में जानकारी दी
महिला ने 20 अगस्त, 2021 को एक पत्र के जरिये बीमा कंपनी को दुर्घटना के बारे में जानकारी दी। हालांकि, 8 अक्टूबर, 2021 को इंश्योरेंस क्लेम को खारिज कर दिया गया। कंपनी का आरोप था कि नुकसान दुर्घटना की रिपोर्ट करने से पहले ही हो चुका था। उन्होंने गाड़ी के मालिक बदलने और गाड़ी की हालत के बारे में जानकारी न देने का भी हवाला दिया।
उन्होंने आगे कहा कि शोरूम के अनुमान के मुताबिक, गाड़ी की मरम्मत में लगभग 4-5 लाख रुपये का खर्च आना था। शिकायतकर्ता ने कहा कि क्लेम पॉलिसी के दायरे में आता था और दुर्घटना की जानकारी तय समय-सीमा के भीतर दी गई थी।
महिला ने आरोप लगाया कि इंश्योरेंस क्लेम को खारिज करना सर्विस में कमी और गलत व्यापारिक तरीका था, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान, परेशानी और मानसिक पीड़ा हुई। इसके बाद उन्होंने कमीशन का रुख किया। कमीशन के सामने वकील रामुलु गोब्बुर ने उनका पक्ष रखा।
बीमा कंपनी का पक्ष
कंपनी ने अपने वकील गंगाधर राव देशपांडे के जरिये तर्क दिया कि महिला ने कथित नुकसान के 8 दिन बाद गाड़ी को हुए नुकसान की जानकारी देने के लिए कंपनी से संपर्क किया था। यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता ने नुकसान की जानकारी देने में हुई देरी का कोई कारण नहीं बताया और पॉलिसी के तहत नुकसान की समय पर जांच के लिए तुरंत जानकारी देना जरूरी था।
यह भी बताया गया कि नुकसान का आकलन करने और तथ्यों की पुष्टि करने के लिए एक सर्वेयर और जांचकर्ता नियुक्त किया गया था। बीमा कंपनी के अनुसार, एक फोरेंसिक रिपोर्ट से पता चला कि नुकसान कथित दुर्घटना की तारीख से काफी पहले हुआ था। बीमा कंपनी ने इस बात पर भी जोर दिया कि कथित दुर्घटना से सिर्फ चार दिन पहले, 20 जुलाई 2021 को गाड़ी का मालिकाना हक ट्रांसफर किया गया था और आरोप लगाया कि पॉलिसी लेते समय गाड़ी की पहले से मौजूद स्थिति के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी।
वकील ने आगे कहा कि चूंकि शिकायतकर्ता पॉलिसी की शर्तों और नियमों का पालन करने में विफल रही और जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किए, इसलिए वह पॉलिसी के तहत कोई भी राशि क्लेम करने की हकदार नहीं थी।
एक्सीडेंट से पहले नुकसान का सबूत नहीं मिला- कमीशन
कमीशन ने पाया कि यह आरोप कि गाड़ी को एक्सीडेंट से पहले ही नुकसान पहुंचा था, ठोस दस्तावेजी सबूतों से साबित नहीं हो सका। कमीशन ने कहा, “गाड़ी के मालिक बदलने और उसकी हालत के बारे में जानकारी न देने का आरोप भी किसी उचित संदेह से परे साबित नहीं हुआ है, इसलिए इस तर्क को खारिज किया जाता है।”
कमीशन ने देखा कि सर्वेयर ने नुकसान का अनुमान 6.21 लाख रुपये लगाया था, लेकिन महिला ने पॉलिसी के तहत 5 लाख रुपये का दावा किया था। इसलिए, कमीशन ने मुआवजे की रकम को 5 लाख रुपये तक ही सीमित रखा।
इसके अनुसार, कमीशन ने कंपनी को पॉलिसी के तहत खारिज किए गए दावे की रकम के तौर पर 5 लाख रुपये और शिकायतकर्ता को हुई मानसिक और शारीरिक परेशानी के लिए मुआवजे के तौर पर 50,000 रुपये देने का निर्देश दिया। बीमा कंपनी को मुकदमे के खर्च के लिए 45 दिनों के भीतर 10000 रुपये देने का भी निर्देश दिया गया।
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